इसीलिए तो मुंह काला है झूठ का...


मैंने कुछ महीनों पहले गोविंदा की एक फिल्‍म देखी थी। फिल्‍म का नाम था- क्‍योंकि मैं झूठ नहीं बोलता। इसमें गोविंदा ने एक वकील का किरदार निभाया था। फिल्‍म में दिखाया गया है कि जब तक गोविंदा झूठ बोलता है तब तक उसकी वकालत की दुकान खूब चलती है। वह सिर्फ अपने धंधे में ही झूठ नहीं बोलता बल्कि निजी जिंदगी में भी सिर्फ झूठ ही बोलता है। उसकी इस आदत से उसका नन्‍हा बेटा बड़ा परेशान है। वह रात में टूटते तारे को देखकर मन्‍नत मांगता है कि ईश्‍वर कुछ ऐसा करिश्‍मा कर दें कि उसके पिता सिर्फ सच ही बोलें। ईश्‍वर नन्‍हें बालक की गुहार सुन लेते हैं और गोविंदा चाहकर भी झूठ नहीं बोल पाता। इसके बाद उसके कैरियर में तो भूचाल आता ही है उसकी निजी जिंदगी भी तबाह हो जाती है। पत्‍नी बनीं सुस्मिता सेन घर छोड़कर चली जाती हैं। उसका असिस्‍टेंट उसे छोड़ जाता है। वह उन्‍हीं लोगों के खिलाफ अदालत में जहर उगलने लगता है जिनका कि वह वकील होता है और जिनसे उसने पैसे लिए होते हैं। इस तरह
वह कई परेशानियों से घिर जाता है। मैंने यह फिल्‍म देखकर यही जाना कि झूठ ही वकालत है। वकील का हथियार झूठ ही है। यदि वह झूठ बोलना छोड़ दे तो ख्‍याति तो अर्जित कर सकता है लेकिन धन कभी नहीं। लेकिन बगैर आजकल तो धन ही चाहिए, ख्‍याति तो इसके बाद मिल ही जाती है। वकालत पहले की तरह समाजसेवा का मार्ग नहीं बल्कि जेब भरने का रास्‍ता बनकर रह गया है। उस फिल्‍म की यह सच्‍चाई अखबारों में पिछले दिनों आयी एक खबर ने साबित कर दिया। हम जानकर हैरान रह गए कि न्‍यायालय पर मुकदमों के बोझ को कम करने वाले जज को शाबाशी की बजाय वकीलों ने उनसे धीमी गति से न्‍याय करने की गुहार लगा डाली।
हो सकता है कि आपने खबर न पढ़ी हो या आपको ध्‍यान न आ रही हो। दरअसल, आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के सिविल न्यायालय में पिछले दिनों एक न्यायाधीश जे. वी. वी. सत्यनारायण मूर्ति ने एक दिन में रिकॉर्ड 111 मामलों का निपटारा किया। लगभग साढे़ तीन महीने के कार्यकाल के भीतर ही उक्‍त न्यायाधीश मूर्ति ने लगभग 500 मामलों का निपटारा कर दिया है। उनकी अदालत में अभी 1,000 और मामले लंबित हैं। न्‍यायाधीश के इस काम से पूरे देश के लोग खुश हुए, सिवाय वकीलों के। हालत यह है कि मंगलागिरी शहर के सिविल न्यायालय के वकीलों का एक वर्ग न्‍यायाधीश के इस अंदाज से खफा हो गया है। वकीलों ने बड़ी ही बेशर्मी से लोगों के हितों को ताक पर रखते हुए यह तक कह डाला कि यदि न्‍यायाधीश ने इसी तरह फैसले दिए तो वे बेरोजगार हो जाएंगे। मंगलागिरी बार एसोसिएशन के संस्थापक अध्यक्ष ए. संजीव रेड्डी ने कहा है कि वकीलों ने न्यायाधीश से कहा है कि यदि वह मुकदमों का निपटारा इसी गति से करते रहेंगे तो उनके फाके करने की नौबत आ जाएगी।
उल्लेखनीय है कि पूरे देश की अदालतों में तकरीबन तीन करोड़ मामले लंबित हैं। रोज आम आदमी न्‍यायालय की दौड़ लगा रहा है। कई-कई मुकदमों में तो जिन लोगों पर मुकदमा हुआ है उनमें से अधिकतर की मौत तक हो चुकी है। अभी कुछ दिनों पहले हिंदी दैनिक पत्र दैनिक जागरण द्वारा इस सिलसिले में चलाए गए जन जागरण अभियान से न्‍यायालयों में बढ़े भ्रष्‍टाचार व न्‍यायिक प्रक्रिया की जटिलताओं तथा आम आदमी के न्‍याय मिलने में हो रही अत्‍यधिक देरी से परिचित होने का मौका मिला। बहुत पहले न्‍यायालय की इस तारीख पर एक फिल्‍म तक बन चुकी है। फिल्‍म दामिनी का एक डॉयलॉग कोई नहीं भूलता- सन्‍नी देयोल न्‍यायालय में चिल्‍ला रहे है। आदमी न्‍यायालय जाता है न्‍याय लेने, लेकिन उसे मिलती है तो तारीख। और अगली तारीख को फिर मिल जाती है एक तारीख। न्‍याय तो कभी नहीं मिलता बस मिलती रहती है तारीख...। सच ही तो है, न्‍यायालय में न्‍याय तो किसी-किसी को ही मिलता है, तारीखें सबकों मिल जाती हैं। बहुत कम ऐसा होता है कि बगैर तारीख के किसी मुकदमे का फैसला हो जाए। और जब किसी न्‍यायाधीश ने ऐसा प्रेरणादायक कदम उठाने की कोशिश की तो उसका उत्‍साह बढ़ाने के बजाय न्‍याय के सिपाही-वकील उनके पैर खींच रहे हैं। अपने स्‍वार्थों के लिए आम आदमी की जेब काटने वालों से ऐसी ही उम्‍मीद की जा सकती है। वाकई वकीलों ने साबित कर दिया कि उनका जन्‍म आम आदमी का खून चूसने और झूठ का साम्राज्‍य कायम करने के लिए ही हुआ है। यह कोई मेरी व्‍यक्तिगत राय नहीं है, यह तो न्‍यायाधीश के अच्‍छे कदम पर अपनी गलत प्रतिक्रिया देकर वकीलों ने खुद ही साबित किया है।

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