वे माफ करें, जिनके लिए उच्छृंखलता ही स्वतंत्रता है...!
धर्म व संस्कृति से जुड़ाव, किसी भी राष्ट्र का मूल मंत्र, मूल आधार है। यह उन नागरिकों के चरित्र निर्माण का भी मूल आधार है, जिनके कंधों पर खड़ा होकर कोई राष्ट्र विकास की सीढि़यां चढ़ता है। वर्तमान समय में, जब राष्ट्र का विकास सभी सरकारों के एजेंडे में शामिल है, भूलवश नागरिकों के चरित्र निर्माण का कर्तव्य शायद किसी को याद नहीं रहा। शायद, इसीलिए भारत जैसा राष्ट्र अपनी त्याग व बलिदान की संस्कृति से पीछे जाकर, पश्चिम की भोगी सभ्यता में आगे बढ़ने का पाप करने लगा है। आर्थिक आजादी की अंधी दौड़ में, ऋषि-संतों का यह देश सांस्कृतिक गुलामी की ओर कितना आगे बढ़ चुका है, इस पर विचार करने तक के लिए समय नहीं है भौतिक लालसाओं से पीडि़त सत्ता के पास।
अनुकरण बुरी बात नहीं, परंतु अंधानुकरण अच्छी बात नहीं! और अनुकरण या अंधानुकरण भी किसका? यह कोई विशाल प्रश्न नहीं कि अनुकरण किन बातों का होना चाहिए! हम किसी का नकल तभी करते हैं, जब वह हमसे बेहतर हो। यह, यूॅं भी हो सकता है कि हम किसी का अंधानुकरण तब करने लग जाते हैं, जब हम यह समझ लें कि वह सदैव ही हमसे बेहतर है और तमाम उन बातों की नकल करने में भी संकोच नहीं करते, जिनमें हम उनसे कहीं बेहतर होते है। भारतीय सत्ता का यही भ्रम कि पश्चिम प्रत्येक मामले में पूरब से सर्वश्रेष्ठ है, अब पश्चिमी अंधानुकरण के रूप में सामने आने लगा है। इस अनुकरण और अंधानुकरण के भरपूर परिणाम मिले हैं और मिल भी रहे हैं। आर्थिक आजादी व समृद्धि की मिसाल बने पश्चिमी देशों के अनुकरण से हम इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, परंतु सांस्कृतिक रूप से बेहद गरीब उन देशों की संस्कृति के अंधानुकरण से हम और भी तेजी से पीछे जा रहे हैं।
दिल्ली में एक युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म के बाद तरह-तरह के बयान धर्माचार्यों, राजनीतिज्ञों व संगठनों के प्रमुखों द्वारा दिए जा रहे हैं। आम लोग भी अपनी राय प्रकट कर रहे हैं। इसी क्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत भी बोल ही गए- नारी अपनी मर्यादा में रहे। बयान का घोर राजनीतिकरण हुआ। हमें समझ में नहीं आता कि इसमें गलत क्या है? नारी हो या पुरूष, जब वह अपनी मर्यादा तोड़ता है तभी तो अमर्यादित आचरण समाज में होते हैं! फिर, मर्यादा में रहने की बात बुरी कैसे हो गयी? कई संगठनों के बहकावे पर नारी समाज ने भी इस बयान को अपनी आजादी से जोड़ लिया और मोहन भागवत को माफी मागने की बात होने लगी। किस बात की माफी? सत्य बोलने पर माफी? सत्य बचन अपराध है? एक चैनल ने लगे हाथ बयान का सर्वे भी करा दिया। 45 फीसदी लोगों ने कहा कि श्री भागवत का बयान नारियों को अपमानित करने वाला है, जबकि 55 फीसदी का कहना था कि इस बयान से नारी का अपमान नहीं हुआ। यानी बात, और भी आगे बढ़कर नारियों के अपमान से जोड़ दी गयी। बयान का ऐसा राजनीतिकरण हुआ कि सभी पार्टियां स्वयं को नारियों का सबसे बड़ा हितैषी करार देते हुए इस बयान को नारी विरोधी साबित करने में सफल हो गईं। हमारी समझ में बयान एकतरफा हो सकता है लेकिन गलत कदाचित नहीं है। यह अवश्य है कि सिर्फ नारियों को ही नहीं, पुरूषों को भी मर्यादा में रहने की आवश्यकता है। जो लोग नारियों के मर्यादा में रहने की बात का विरोध कर रहे हैं वे आखिर कहना क्या चाहते हैं? नारियों को मर्यादा में नहीं रहना चाहिए? यदि ऐसा है तब तो वे इसकी शुरूआत अपने घर से ही करें तो अच्छा! हाॅं, श्री भागवत का इस बयान की कुछ हद तक निंदा होनी चाहिए जिसमें उन्होंने शादी को सौदा करार दिया है। कुछ हद तक इसलिए कि इस बयान से शादी जैसे पवित्र संबंध में बंधे लोगों को पीड़ा पहुॅंची है लेकिन कुछ ही हद तक इसलिए क्योंकि यह बयान सत्य से परे भी नहीं। जब से शादी का पंजीकरण होने लगा तब से यह कुछ हद तक एक सौदा या काॅन्ट्रैक्ट तो हो ही गया। भारतीय परम्परा में शादी एक संस्कार है, सौदा नहीं लेकिन, भारतीय संस्कृति स्वीकार किसे है? सभी तो स्वच्छंदता चाह रहे हैं! ऐसे में, उन्हें शादी का सौदा कहा जाना क्यों नहीं पच रहा क्योंकि यह भी तो पश्चिमी संस्कृति का ही शब्द है?
इस संबंध में धर्मगुरू आशाराम बापू के बयान की हम निश्चय ही निंदा करते हैं, जो निंदनीय है भी। उन्होंने अपने बयान में कहा है कि यदि दिल्ली गैंग रेप की शिकार युवती दरिंदों के सामने गिड़गिड़ाती, उनके हाथ-पांव पकड़ती, उन्हें धर्म व ईश्वर की दुहाई देती, उन्हें धर्म का भाई कहती तो वे शायद इतनी दरिंगदगी न दिखाते। आशाराम जी को यह समझना चाहिए कि जिसके साथ दरिंदगी होगी, वह कभी भी इसे सहजता से नहीं होने देगा। यदि समर्थ होगा तो इसका विरोध करेगा और यदि असमर्थ होगा तब भी ऐसा न करने का अनुरोध तो अवश्य ही करेगा। आशाराम बापूजी का बयान वास्तव में बेतुका है।
हमें लगता है कि यह सारे बयान इसलिए आ रहे हैं क्योंकि उन्हें बयान देने का मौका दिया जा रहा है। मीडिया भी गैंग रेप के संबंध में दिए जा रहे किसी भी उल-जलूल बयान का बड़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत कर रहा है। राजनीति करने वालों व प्रसिद्धि की चाह रखने वालों को गैंग रूप एक अवसर के रूप में दिख रहा है। वे यह जान रहे हैं कि इस समय वे चाहें इस संबंध में कुछ भी बोलें, मीडिया उसे तरजीह देगा और अखबारों के पन्नों व टीवी की स्क्रीन पर वे दिखेंगे। सरकार को भी ऐसे बयानों से अपने बचने का एक अवसर मिला है। गैंग रेप व बलात्कार की बढ़ती घटनाओं को लेकर अब तक जो मीडिया सरकार को घेर रहा था, अब ऐसे ही बयानों में उलझता जा रहा है। आम आदमी भी कहीं न कहीं गुमराह हो रहा है और ऐसे बयानों की निंदा करते ही उसका समय जाया हो रहा है जबकि असल मुद्दा कहीं भटकने लगा है।
विमर्श की बात यह नहीं कि किसने क्या कहा? कोई भी वही कहता है, जो उसके आचरण में हो, अथवा जितनी उसकी बुद्धि हो, जैसा वह सोचता हो! ऐसे में उसके बयान सिर्फ उसकी मानसिकता तय करते हैं, देश की आधी आबादी की तकदीर नहीं लिख सकते। अतः विमर्श इस बात पर होनी चाहिए कि ऐसा क्या हो जो ऐसे वारदात न हों, और ऐसा क्या गलत हो रहा है जो ऐसी घटनाएं बढ़ रही हैं?
राष्ट्र की आबादी का एक बड़ा हिस्सा स्वयं को स्वतंत्र महसूस नहीं कर रहा! उसे और भी अधिक आजादी चाहिए। जिसे हम उच्छृंखलता कहते हैं, नई पीढ़ी का एक बड़ा वर्ग उसे ही वास्तविक आजादी मान रहा है। कहीं न कहीं यह उच्छृंखलता अपराध को बढ़ावा दे रही है। भारतीय संस्कृति से दूरी और पश्चिमी सभ्यता को व्यवहार में शामिल कर लेना भी कहीं न कहीं इसके लिए जिम्मेदार है। संयुक्त परिवारों के विघटन के पीछे यही बात हमें दिखती है कि अब सिर्फ पति-पत्नी व उनके बच्चे ही परिवार हैं। यदि यही परिवार है तब तो पति-पत्नी यानी माता-पिता की भूमिका अपने बच्चों के प्रति और भी गंभीर होनी चाहिए क्योंकि संयुक्त परिवार में इन बच्चों के प्रति जिम्मेदारी निभाने वाले दादा-दादी व अन्य परिवारीजन तो रहे नहीं? परंतु हो यह रहा है कि माता-पिता भी अपने कैरियर व अन्य उद्देश्यों में इतने उलझते जा रहे हैं कि बच्चे को शिक्षा तो खूब देते-दिलाते हैं, पर संस्कार देने में चूक कर जाते हैं। माता-पिता द्वारा की गयी यह गलती आगे जाकर बच्चे को अमानवीय व्यवहारों का कारण बनती है। एक बात और, हम जहाॅं कहीं भी रहते हैं, अपने बच्चे के लिहाज से उस वातावरण का वाच करते हैं। यह जानने की कोशिश करते हैं कि यह माहौल हमारे बच्चे के अनुकूल है अथवा नहीं! और यदि नहीं होता तो वहां बच्चे को जाने से रोकते हैं। यदि हमारा घर ही किसी ऐसे माहौल में हो तो हम बच्चों को घर के अंदर ही खेलने, पढ़ने को कहते हैं। लेकिन, हम यह भूल जाते हैं कि बच्चे को हम हिंसा, बलात्कार व अन्य बुराइयों का वातावरण तो घर के अंदर ही मुहैया करा रहे हैं! एक तरफ हम उसे बुरे लोगों, बुरे माहौल से बचाते हैं तो दूसरी तरफ उसको उसी ओर झोक भी देते हैं। आप पूछेंगे कैसे? आपकी नजर में टेलीविजन क्या है? दिन-रात हत्या, बलात्कार की घटनाएं परोसते सैकड़ों न्यूज चैनल, दिन-रात हत्या, बलात्कार के सीन परोसती फिल्में...। बच्चे के मस्तिष्क में जाने-अनजाने ऐसा माहौल बन जाता है कि वह इन चीजों का आम बात समझने लगता है। धीरे-धीरे उसके अंदर की संवेदना मरने लगती है और हिंसक प्रवृत्तियां जन्म लेती हैं। इसे एक उदाहरण के माध्यम से समझा जा सकता है। अभी कल ही हमने एक मित्र के मोबाइल पर राजीव दीक्षित जी का भाषण सुना। उसमें उन्होंने बताया है कि कैसे हरिश्चन्द्र के नाटक से प्रभावित होकर मोहनदास करमचंद गांधी महात्मा गांधी बन गए। एक नाटक यदि एक बच्चे पर सकारात्मक प्रभाव डालकर उसे इतना महान बना सकता है तो रोज सेक्स, हत्या परोसते चैनल किसी बच्चे को यदि बलात्कारी, हत्यारा बना दें, तो आश्चर्य कैसा?
हमारी जो छोटी सी समझ है, उसमें तो बलात्कार ही नहीं, तमाम तरह की बुराइयों की जड़ यही सब नजर आ रही है! बाकी, हमसे अधिक समझदार हैं, कुछ आप भी कहें!
दिल्ली में एक युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म के बाद तरह-तरह के बयान धर्माचार्यों, राजनीतिज्ञों व संगठनों के प्रमुखों द्वारा दिए जा रहे हैं। आम लोग भी अपनी राय प्रकट कर रहे हैं। इसी क्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत भी बोल ही गए- नारी अपनी मर्यादा में रहे। बयान का घोर राजनीतिकरण हुआ। हमें समझ में नहीं आता कि इसमें गलत क्या है? नारी हो या पुरूष, जब वह अपनी मर्यादा तोड़ता है तभी तो अमर्यादित आचरण समाज में होते हैं! फिर, मर्यादा में रहने की बात बुरी कैसे हो गयी? कई संगठनों के बहकावे पर नारी समाज ने भी इस बयान को अपनी आजादी से जोड़ लिया और मोहन भागवत को माफी मागने की बात होने लगी। किस बात की माफी? सत्य बोलने पर माफी? सत्य बचन अपराध है? एक चैनल ने लगे हाथ बयान का सर्वे भी करा दिया। 45 फीसदी लोगों ने कहा कि श्री भागवत का बयान नारियों को अपमानित करने वाला है, जबकि 55 फीसदी का कहना था कि इस बयान से नारी का अपमान नहीं हुआ। यानी बात, और भी आगे बढ़कर नारियों के अपमान से जोड़ दी गयी। बयान का ऐसा राजनीतिकरण हुआ कि सभी पार्टियां स्वयं को नारियों का सबसे बड़ा हितैषी करार देते हुए इस बयान को नारी विरोधी साबित करने में सफल हो गईं। हमारी समझ में बयान एकतरफा हो सकता है लेकिन गलत कदाचित नहीं है। यह अवश्य है कि सिर्फ नारियों को ही नहीं, पुरूषों को भी मर्यादा में रहने की आवश्यकता है। जो लोग नारियों के मर्यादा में रहने की बात का विरोध कर रहे हैं वे आखिर कहना क्या चाहते हैं? नारियों को मर्यादा में नहीं रहना चाहिए? यदि ऐसा है तब तो वे इसकी शुरूआत अपने घर से ही करें तो अच्छा! हाॅं, श्री भागवत का इस बयान की कुछ हद तक निंदा होनी चाहिए जिसमें उन्होंने शादी को सौदा करार दिया है। कुछ हद तक इसलिए कि इस बयान से शादी जैसे पवित्र संबंध में बंधे लोगों को पीड़ा पहुॅंची है लेकिन कुछ ही हद तक इसलिए क्योंकि यह बयान सत्य से परे भी नहीं। जब से शादी का पंजीकरण होने लगा तब से यह कुछ हद तक एक सौदा या काॅन्ट्रैक्ट तो हो ही गया। भारतीय परम्परा में शादी एक संस्कार है, सौदा नहीं लेकिन, भारतीय संस्कृति स्वीकार किसे है? सभी तो स्वच्छंदता चाह रहे हैं! ऐसे में, उन्हें शादी का सौदा कहा जाना क्यों नहीं पच रहा क्योंकि यह भी तो पश्चिमी संस्कृति का ही शब्द है?
इस संबंध में धर्मगुरू आशाराम बापू के बयान की हम निश्चय ही निंदा करते हैं, जो निंदनीय है भी। उन्होंने अपने बयान में कहा है कि यदि दिल्ली गैंग रेप की शिकार युवती दरिंदों के सामने गिड़गिड़ाती, उनके हाथ-पांव पकड़ती, उन्हें धर्म व ईश्वर की दुहाई देती, उन्हें धर्म का भाई कहती तो वे शायद इतनी दरिंगदगी न दिखाते। आशाराम जी को यह समझना चाहिए कि जिसके साथ दरिंदगी होगी, वह कभी भी इसे सहजता से नहीं होने देगा। यदि समर्थ होगा तो इसका विरोध करेगा और यदि असमर्थ होगा तब भी ऐसा न करने का अनुरोध तो अवश्य ही करेगा। आशाराम बापूजी का बयान वास्तव में बेतुका है।
हमें लगता है कि यह सारे बयान इसलिए आ रहे हैं क्योंकि उन्हें बयान देने का मौका दिया जा रहा है। मीडिया भी गैंग रेप के संबंध में दिए जा रहे किसी भी उल-जलूल बयान का बड़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत कर रहा है। राजनीति करने वालों व प्रसिद्धि की चाह रखने वालों को गैंग रूप एक अवसर के रूप में दिख रहा है। वे यह जान रहे हैं कि इस समय वे चाहें इस संबंध में कुछ भी बोलें, मीडिया उसे तरजीह देगा और अखबारों के पन्नों व टीवी की स्क्रीन पर वे दिखेंगे। सरकार को भी ऐसे बयानों से अपने बचने का एक अवसर मिला है। गैंग रेप व बलात्कार की बढ़ती घटनाओं को लेकर अब तक जो मीडिया सरकार को घेर रहा था, अब ऐसे ही बयानों में उलझता जा रहा है। आम आदमी भी कहीं न कहीं गुमराह हो रहा है और ऐसे बयानों की निंदा करते ही उसका समय जाया हो रहा है जबकि असल मुद्दा कहीं भटकने लगा है।
विमर्श की बात यह नहीं कि किसने क्या कहा? कोई भी वही कहता है, जो उसके आचरण में हो, अथवा जितनी उसकी बुद्धि हो, जैसा वह सोचता हो! ऐसे में उसके बयान सिर्फ उसकी मानसिकता तय करते हैं, देश की आधी आबादी की तकदीर नहीं लिख सकते। अतः विमर्श इस बात पर होनी चाहिए कि ऐसा क्या हो जो ऐसे वारदात न हों, और ऐसा क्या गलत हो रहा है जो ऐसी घटनाएं बढ़ रही हैं?
राष्ट्र की आबादी का एक बड़ा हिस्सा स्वयं को स्वतंत्र महसूस नहीं कर रहा! उसे और भी अधिक आजादी चाहिए। जिसे हम उच्छृंखलता कहते हैं, नई पीढ़ी का एक बड़ा वर्ग उसे ही वास्तविक आजादी मान रहा है। कहीं न कहीं यह उच्छृंखलता अपराध को बढ़ावा दे रही है। भारतीय संस्कृति से दूरी और पश्चिमी सभ्यता को व्यवहार में शामिल कर लेना भी कहीं न कहीं इसके लिए जिम्मेदार है। संयुक्त परिवारों के विघटन के पीछे यही बात हमें दिखती है कि अब सिर्फ पति-पत्नी व उनके बच्चे ही परिवार हैं। यदि यही परिवार है तब तो पति-पत्नी यानी माता-पिता की भूमिका अपने बच्चों के प्रति और भी गंभीर होनी चाहिए क्योंकि संयुक्त परिवार में इन बच्चों के प्रति जिम्मेदारी निभाने वाले दादा-दादी व अन्य परिवारीजन तो रहे नहीं? परंतु हो यह रहा है कि माता-पिता भी अपने कैरियर व अन्य उद्देश्यों में इतने उलझते जा रहे हैं कि बच्चे को शिक्षा तो खूब देते-दिलाते हैं, पर संस्कार देने में चूक कर जाते हैं। माता-पिता द्वारा की गयी यह गलती आगे जाकर बच्चे को अमानवीय व्यवहारों का कारण बनती है। एक बात और, हम जहाॅं कहीं भी रहते हैं, अपने बच्चे के लिहाज से उस वातावरण का वाच करते हैं। यह जानने की कोशिश करते हैं कि यह माहौल हमारे बच्चे के अनुकूल है अथवा नहीं! और यदि नहीं होता तो वहां बच्चे को जाने से रोकते हैं। यदि हमारा घर ही किसी ऐसे माहौल में हो तो हम बच्चों को घर के अंदर ही खेलने, पढ़ने को कहते हैं। लेकिन, हम यह भूल जाते हैं कि बच्चे को हम हिंसा, बलात्कार व अन्य बुराइयों का वातावरण तो घर के अंदर ही मुहैया करा रहे हैं! एक तरफ हम उसे बुरे लोगों, बुरे माहौल से बचाते हैं तो दूसरी तरफ उसको उसी ओर झोक भी देते हैं। आप पूछेंगे कैसे? आपकी नजर में टेलीविजन क्या है? दिन-रात हत्या, बलात्कार की घटनाएं परोसते सैकड़ों न्यूज चैनल, दिन-रात हत्या, बलात्कार के सीन परोसती फिल्में...। बच्चे के मस्तिष्क में जाने-अनजाने ऐसा माहौल बन जाता है कि वह इन चीजों का आम बात समझने लगता है। धीरे-धीरे उसके अंदर की संवेदना मरने लगती है और हिंसक प्रवृत्तियां जन्म लेती हैं। इसे एक उदाहरण के माध्यम से समझा जा सकता है। अभी कल ही हमने एक मित्र के मोबाइल पर राजीव दीक्षित जी का भाषण सुना। उसमें उन्होंने बताया है कि कैसे हरिश्चन्द्र के नाटक से प्रभावित होकर मोहनदास करमचंद गांधी महात्मा गांधी बन गए। एक नाटक यदि एक बच्चे पर सकारात्मक प्रभाव डालकर उसे इतना महान बना सकता है तो रोज सेक्स, हत्या परोसते चैनल किसी बच्चे को यदि बलात्कारी, हत्यारा बना दें, तो आश्चर्य कैसा?
हमारी जो छोटी सी समझ है, उसमें तो बलात्कार ही नहीं, तमाम तरह की बुराइयों की जड़ यही सब नजर आ रही है! बाकी, हमसे अधिक समझदार हैं, कुछ आप भी कहें!
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