उत्तर प्रदेश सरकार को तमाचा है यह इच्छामृत्यु पत्र
उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जनपद के विशुनपुरा थाना क्षेत्र निवासी एक गरीब दम्पत्ति ने राष्ट्रपति से इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी है। मामला दिल दहला देने वाला है। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है और यहां के तंत्र में लोक की यह स्थिति कई सोचों को जन्म देती है। केन्द्र सरकार से लेकर राज्य सरकारें तक के दावों, घोषणाओं पर नजर डालें तो ऐसा लगता है कि देश में गरीबों के लिए सैकड़ों योजनाएं हैं। लेकिन इन योजनाओं का क्या फायदा जब ये किसी गरीब का पेट तक नहीं भर सकती। स्थिति यह कि उसे मृत्यु का वरण करने की सोचना पड़ता है।
आइए सबसे पहले लोकतंत्रीय व्यवस्था और शासन की निकम्मेपन को दर्शाती इस खबर से अवगत हो लें। कुशीनगर जनपद के पंचायत पडरौन मडूरही में चण्डी वर्मा के पुत्र जगदीश वर्मा कई वर्षों से फाइलेरिया से पीडि़त हैं। इनकी पत्नी भी मानसिक रोगी हैं। दोनों की बीमारी से काफी लंबी जंग चली लेकिन अंत में वे हार गए और बीमारी अभी भी उन्हे हरा देने को आमादा है। गरीबी के आवरण से ढ़के इस परिवार की यह बीमारी अब शायद उनकी मौत के साथ ही जाए। जगदीश मजदूरी करने की अवस्था में नहीं है और पत्नी मानसिक रोगी होने के कारण कुछ समझ नहीं पाती। दवा के लिए पैसे नहीं रह गए हैं। इनकी गोला बाजार स्थित मकान दवा कराने के लिए 70 हजार रुपये में पहले ही गिरवी रखी जा चुकी है। ये पैसे भी दवा में खर्च हो चुके हैं लेकिन बीमारी अभी भी वही है। यह तो रही जगदीश की अपने संसाधनों के बूते बीमारी से लड़ने की बात। अब जरा, शासन से मदद लेने की इस परिवार की कोशिशों पर भी गौर करें। इस परिवार ने जिलाधिकारी से लेकर सूबे के बड़े पदाधिकारियों तक गुहार लगाई लेकिन कुछ भी काम नहीं आया। जिलाधिकारी के अनुसार उन्होंने शासन को इसकी रिपोर्ट प्रेषित कर दी और रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए लोक शिकायत विभाग के प्रमुख सचिव ने विस्तृत रिपोर्ट भी मांगी है। लेकिन विस्तृत रिपोर्ट के जाते-जाते शायद कहीं यह दंपत्ति ही इस दुनियां से न चला जाए। अब जबकि यह दंपत्ति सब ओर से थक-हार चुका है, इच्छा मृत्यु के ऑप्शन का रास्ता ढूंढा है। दंपत्ति ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी है।
बता दें कि अभी उत्तर प्रदेश में दलित बेटी के रूप में जानी जाने वाली सुश्री मायावती की सरकार है। वे खुद को गरीबों, असहायों का मसीहा सुनना पसंद करती हैं और चुनावी घोषणाओं में यही अहसास दिलाती हैं कि प्रदेश में उनके अलावा कोई भी गरीबों का हितैषी नेता नहीं। लेकिन उन्हीं के शासन में एक गरीब परिवार रोटी को मोहताज है। सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की मौजूदगी के बावजूद इनकी बीमारी दूर नहीं हो रही। एक बार को राज्य सरकार की निकम्मेपन को भूल जाएं तो देश की वर्तमान सरकार भी कम निकम्मी नहीं। कांग्रेस ने चुनाव में बड़े-बड़े पोस्टरों के माध्यम से लोगों को यह अहसास दिलाया था कि कांग्रेस का हाथ- आम आदमी के साथ। यह आदमी कौन है। क्या ये दंपत्ति वे आम आदमी नहीं हैं। आम आदमी के रूप में कांग्रेस किसे मानती है। और यदि ये दंपत्ति आम आदमी है तो फिर सरकार इनके साथ क्यों नहीं। दावों और हकीकत में इतना फर्क कैसे। यह लोकतंत्र पर ओछी राजनीति का पलड़ा भारी होने वाली स्थिति का जीता-जागता उदाहरण है। चुनाव के समय कांग्रेस ने प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के माध्यम से अतुलनीय भारत का खूब प्रचार-प्रसार किया। क्या यह उसी अतुलनीय भारत की झलक है। सरकार कांग्रेस की भी है और सरकार बसपा की भी। लेकिन आदमी तो वहीं खड़ा है जहां वह पहले था। जगदीश के परिवार का यह इच्छा मृत्यु पत्र भारत की लोकतांत्रिक सरकार को एक बड़ा तमाचा है जिसे वह समझ सके तो शायद आगे की तस्वीर इतनी भयावह न हो।
आइए सबसे पहले लोकतंत्रीय व्यवस्था और शासन की निकम्मेपन को दर्शाती इस खबर से अवगत हो लें। कुशीनगर जनपद के पंचायत पडरौन मडूरही में चण्डी वर्मा के पुत्र जगदीश वर्मा कई वर्षों से फाइलेरिया से पीडि़त हैं। इनकी पत्नी भी मानसिक रोगी हैं। दोनों की बीमारी से काफी लंबी जंग चली लेकिन अंत में वे हार गए और बीमारी अभी भी उन्हे हरा देने को आमादा है। गरीबी के आवरण से ढ़के इस परिवार की यह बीमारी अब शायद उनकी मौत के साथ ही जाए। जगदीश मजदूरी करने की अवस्था में नहीं है और पत्नी मानसिक रोगी होने के कारण कुछ समझ नहीं पाती। दवा के लिए पैसे नहीं रह गए हैं। इनकी गोला बाजार स्थित मकान दवा कराने के लिए 70 हजार रुपये में पहले ही गिरवी रखी जा चुकी है। ये पैसे भी दवा में खर्च हो चुके हैं लेकिन बीमारी अभी भी वही है। यह तो रही जगदीश की अपने संसाधनों के बूते बीमारी से लड़ने की बात। अब जरा, शासन से मदद लेने की इस परिवार की कोशिशों पर भी गौर करें। इस परिवार ने जिलाधिकारी से लेकर सूबे के बड़े पदाधिकारियों तक गुहार लगाई लेकिन कुछ भी काम नहीं आया। जिलाधिकारी के अनुसार उन्होंने शासन को इसकी रिपोर्ट प्रेषित कर दी और रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए लोक शिकायत विभाग के प्रमुख सचिव ने विस्तृत रिपोर्ट भी मांगी है। लेकिन विस्तृत रिपोर्ट के जाते-जाते शायद कहीं यह दंपत्ति ही इस दुनियां से न चला जाए। अब जबकि यह दंपत्ति सब ओर से थक-हार चुका है, इच्छा मृत्यु के ऑप्शन का रास्ता ढूंढा है। दंपत्ति ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी है।
बता दें कि अभी उत्तर प्रदेश में दलित बेटी के रूप में जानी जाने वाली सुश्री मायावती की सरकार है। वे खुद को गरीबों, असहायों का मसीहा सुनना पसंद करती हैं और चुनावी घोषणाओं में यही अहसास दिलाती हैं कि प्रदेश में उनके अलावा कोई भी गरीबों का हितैषी नेता नहीं। लेकिन उन्हीं के शासन में एक गरीब परिवार रोटी को मोहताज है। सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की मौजूदगी के बावजूद इनकी बीमारी दूर नहीं हो रही। एक बार को राज्य सरकार की निकम्मेपन को भूल जाएं तो देश की वर्तमान सरकार भी कम निकम्मी नहीं। कांग्रेस ने चुनाव में बड़े-बड़े पोस्टरों के माध्यम से लोगों को यह अहसास दिलाया था कि कांग्रेस का हाथ- आम आदमी के साथ। यह आदमी कौन है। क्या ये दंपत्ति वे आम आदमी नहीं हैं। आम आदमी के रूप में कांग्रेस किसे मानती है। और यदि ये दंपत्ति आम आदमी है तो फिर सरकार इनके साथ क्यों नहीं। दावों और हकीकत में इतना फर्क कैसे। यह लोकतंत्र पर ओछी राजनीति का पलड़ा भारी होने वाली स्थिति का जीता-जागता उदाहरण है। चुनाव के समय कांग्रेस ने प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के माध्यम से अतुलनीय भारत का खूब प्रचार-प्रसार किया। क्या यह उसी अतुलनीय भारत की झलक है। सरकार कांग्रेस की भी है और सरकार बसपा की भी। लेकिन आदमी तो वहीं खड़ा है जहां वह पहले था। जगदीश के परिवार का यह इच्छा मृत्यु पत्र भारत की लोकतांत्रिक सरकार को एक बड़ा तमाचा है जिसे वह समझ सके तो शायद आगे की तस्वीर इतनी भयावह न हो।
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