आ खुशी से खुदकुशी कर लें
किसी गलतफहमी में न पड़ें, हम यह फिल्मी गीत गुनगुनाने के मूड में नहीं हैं। वैसे भी हम आधुनिक गानों व फिल्मों से दूर ही रहना पसंद करते हैं, एकाध अपवाद हो सकती हैं। फिलवक्त, हम इस आधुनिक गाने की तर्ज पर होने वाली घटनाओं की भयावहता से आपको रूबरू कराने जा रहे हैं। यह आधुनिक जमाने का फिल्मी गीत है लेकिन अपने जमाने की सुपर हिट फिल्म रही एक-दूजे के लिए का गाना भी याद करें- हम बने तुम बने एक-दूजे के लिए-, उसको कसम लगे-2, जो बिछड़ के एक पल भी जिए...। एक-दूसरे से बिछड़कर एक पल भी न जीने की यह चाह आज के किशोरों-युवाओं को मौत की दहलीज पर ले जा रही है। यूं तो आए दिन ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, लेकिन महानगरों से चलकर गांवों तक पहुंची आत्महत्या की इस भयानक बीमारी से अब भारतीय संस्कृति संकट में नजर आ रही है। एक नया उदाहरण देखने को मिला है बिहार के छपरा जनपद स्थित दौलतगंज मुहल्ले में। आइए सबसे पहले हम आपको एक-दूसरे के साथ जीने की ख्वाहिश के बाद, एक-दूसरे के साथ मरने के अंजाम वाली इस पूरी घटना से रूबरू कराते हैं।
छपरा शहर के पश्चिमी भाग में एक काफी पुराना मुहल्ला है। नाम है- दौलतगंज। इसी मुहल्ले के एक छोटे से हिस्से फीदरबाजार में 3 अप्रैल 10 को दो प्रेमियों ने पुरानी प्रेम कहानियों का इतिहास दोहराया। इतिहास- एक दूसरे के साथ जीने-मरने के किए वादे को निभाने का है। दरअसल, मुहल्ले में मुहम्मद शाहिद उर्फ मुन्ना ठाकुर और डा. बैतुल्लाह का कुछ ही दूरी पर घर है। दोनों घरों की आपसी पहचान तो नहीं थी, लेकिन इन दोनों घरों के लाडलों के रिश्ते बन गए। मुन्ना ठाकुर के 22 वर्षीय पुत्र अशरफ अली और डा. बैतुल्लाह की 16 वर्षीय पुत्री तबस्सुम एक-दूसरे को पसंद करने लगे। घर आस-पास होने के कारण मिलने में कोई कठिनाई नहीं थी, सो मिलना गाजे-बगाहे आसानी से हुआ करता था। लेकिन इस लव स्टोरी में तब भयानक टिवस्ट आ गई जब इन दोनों ने एक दूसरे को अपना जीवन-साथी बनाने का निर्णय लिया। चुपके-चुपके मिलने और छुप-छुप कर प्यार करने वाले तथा शादी को ही प्रेम का मंजिल समझने वाले इन दोनों प्रेमियों की हरकतों ने उनकी मंशा को आखिरकार उनके परिवार वालों तक पहुंचा ही दिया। जब इनकी प्रेम कहानी की खबर घर वालों को मिली तो जैसे उनके घरों में तूफान आ गया। लेकिन प्यार झूकता नहीं की तर्ज पर ये भी अपने परिवार वालों के सामने नहीं झुके और जब भी समय मिला, एक दूजे से मिलते रहे। जैसे-जैसे इनका प्यार बढ़ता गया, वैसे-वैसे इन पर परिवार वालों की बंदिशें भी बढ़ने लगी। जब भी दोनों मिलते परिवार वालों की सख्ती के बारे में बात करते और अपने दोस्तों से इस संबंध में राय लेते। घर वालों से रोज प्रताडि़त होने व उनकी लाख कोशिशों के बाद भी दोनों एक-दूसरे को भूलने को तैयार नहीं थे। आखिरकार दोनों ने मिलकर इन झंझटों से हमेशा के लिए निजात पाने और सदा-सदा के लिए एक-दूजे का होने का उपाय ढूंढ निकाला। उपाय कुछ यह रहा कि इस दुनियां में भले ही लोग नहीं मिलने दें, लेकिन उस दुनियां में जाने के बाद कौन रोक सकेगा। एक-दूजे से जो लोग मिलने नहीं दे रहे, वे एक-दूजे के साथ मरने से नहीं रोक सकते। साथ जी नहीं सकते तो साथ मर तो सकते हैं...। और फिर दोनों ने 3 मई को अंतिम मुलाकात की। दोनों जीभरकर मिलें, बातें की और फिर जहर खा लिया। जहर खाने के बाद दोनों अपने घ्ार को रूखसत हो गए। घर जाकर दोनों की स्थिति खराब हो गयी। परिवारों वालों को तुरंत पता चल गया कि उन्होंने जहर खाया है। प्रेम कहानी की बात तो पहले से ही दोनों के परिवार वालों को मालूम थी, जहर खाने की बात पर वे गंभीर हो गए और तुरंत सदर अस्पताल छपरा में एडमिट कराया। संयोग देखिए, दोनों के परिवार वालों दोनों को अचेतावस्था में लेकर करीब-करीब एक ही साथ एक ही अस्पताल में पहुंच गए। यहां भी चिकित्सकों ने दोनों को एक-दूसरे के बगल में बेड पर लिटाया और उपचार शुरू हो गया। तरह-तरह के उपाय कर उल्टियां करायी जाने लगी। इस दौरान वे कभी होश में आते और कभी बेहोश होते। जब भी आंखें खुलती एक-दूसरे को देख लेते। लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद चिकित्सकीय प्रणाली हार गई और दोनों ने ही दम तोड़ दिया। इसके बाद फिर वहीं, जो अक्सर होता है- पोस्टमार्टम, एफआईआर, जांच, कार्रवाई...। हम पूरी कहानी का लेखा-जोखा नहीं रख रहे। हम बस इस मुद़दे पर हैं कि क्या ऐसे कदम सही हैं।
पहले प्यार और फिर प्यार को अंजाम तक पहुंचाने के लिए खुदकुशी का रास्ता अपनाने वालों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। प्रेमी युगल शादी को ही प्यार की मंजिल मान रहे हैं। क्या एक-दूसरे को दैहिक रूप से प्राप्त कर लेना ही प्यार है। प्रेम तो राधा ने भी श्रीकृष्ण से किया था, लेकिन उनकी न तो शादी ही हुई और न ही उन्होंने इसके लिए खुदकुशी की। मीरा ने कृष्ण से किया, लाख प्रताड़नाएं सही लेकिन खुदकुशी तो उन्होंने भी नहीं की। प्रेम दो आत्माओं का मिलना है न कि दो शरीरों का। अगर प्यार है तो वह तब भी रहेगा जब प्रेमी-प्रेमिका एक दूसरे से दूर हों। उनकी नजदीकियां-दूरियां उन्हें तड़पा सकती हैं लेकिन उनके प्यार को मिटा नहीं सकती। प्यार समर्पण का नाम है, प्यार त्याग का पर्याय है, प्यार शक्ति का नाम है और प्यार ईश्वर का दिया हुआ परम वरदान है जो किसी-किसी को प्राप्त होता है। प्यार तो प्यार है, इसमें मंजिल क्या और रास्ते क्या। प्यार की मंजिल भी प्यार है और प्यार का रास्ता भी प्यार। प्यार की मंजिल कभी शादी नहीं हो सकती और खुदकुशी कर कोई प्यार नहीं पा सकता। दो लोग तब भी आजीवन प्रेम कर सकते हैं जबकि उनकी एक-दूसरे से शादियों न हों, बशर्तें कि उनके प्यार में दैहिक भूख न हों, उनके प्यार में एक-दूसरे के लिए समर्पण और त्याग का भाव हो। खुदकुशी और एक-दूसरे के साथ घर वालों को छोडकर भाग जाने वाले कभी प्रेम नहीं कर सकते। क्योंकि खुदकुशी के रास्ते सिर्फ वे ही चुनते हैं जिनमें इच्छाशक्ति की कमी होती है, जो कमजोर होते हैं और जो खुद से प्यार नहीं करते। जो खुद से प्यार नहीं करते वे एक-दूसरे से क्या प्यार करेंगे। प्यार शक्ति देता है, फिर उसका अंजाम खुदकुशी कैसे हो सकता है। और खुदकुशी कर खुद को खत्म किया जा सकता है, प्यार तो नहीं पाया जा सकता। हां, प्यार खत्म जरूर हो जाता है। क्योंकि कोई भी प्यार तभी तक कर सकता है जब तक कि वह खुद जीवित हो, जब वह ही नहीं रहेगा तो प्यार कौन करेगा। और जब उसका साथी नहीं रहेगा तो वह प्यार किसे करेगा। खुदकुशी कभी प्यार का विकल्प नहीं है और बन भी नहीं सकता। एक बार को कल्पना करें कि आप किसी से प्यार करते हैं और फिर दोनों साथ मरने का निर्णय लेते हैं। लेकिन यह क्या सही है। जहां तक मैं प्यार की बात जनता हूं तो मुझे यही मालूम है कि हम जिसे प्यार करते हैं उसे खरोंच भी आए तो खुद की जान निकल जाती है। फिर हम उसे मरने का सुझाव कैसे दे सकते हैं। हम खुद चाहे मरे या जीए, लेकिन उसे तो नहीं मरने दे सकते ना। हम यदि उसे प्यार करते हैं तो उसके लिए मिट तो सकते हैं, लेकिन ऐसा कोई भी काम नहीं करते सकते जिससे कि उसे चोट पहुंचे। और उसके मरने की बात तो हम सोच ही नहीं सकते। प्यार करने वाले तो अपनी उम्र अपने प्यार के नाम कर देने की ईश्वर से दुआ करते हैं फिर उसके मिटने की बात वे कैसे कर सकते हैं। अब जरा एक बार को यह मान भी लें कि हम एक-दूसरे से प्यार करते हैं, और दोनों मरने का निर्णय ले लेते हैं, लेकिन क्या इस दुनियां में केवल हम ही दोनों हैं। हमें प्यार करने वाले हमारे परिवार वाले नहीं, रिश्तेदार नहीं, कोई और नहीं। यकीनन दुनियां में हमें सबसे अधिक हमारे माता-पिता प्यार करते हैं और हम उन्हें ही ठुकरा देते हैं। हमारे मरने के बाद उनका क्या होगा यह सोचे बगैर खुदकुशी कर बैठते हैं। जो बेइंतहा प्यार करने वाले अपने माता-पिता का सुख-दुख नहीं सोच सकते वे किसी के बारे भी नहीं सोच सकते। और वे कभी प्यार करने वाले या प्यार की समझ रखने वाले भी नहीं हो सकते। प्यार में एक-दूसरे के साथ घर से भाग जाना कुछ हद तक सही भी हो सकता है, लेकिन प्यार में खुदकुशी न सिर्फ प्यार को मिटा देना है बल्कि अपने पीछे अपने परिवार वालों को दुखों और बदनामी का परिणाम छोड़ जाना है। प्यार में खुदकुशी से पहले एक बार को हमें अवश्य सोच लेना चाहिए कि इस दुनियां में केवल हम ही दो नहीं हैं, हमारे अलावे भी और लोग हैं जो हमें प्यार करते हैं। इसलिए केवल एक के लिए सारे लोगों की खुशियां मिटा देना कभी भी सही नहीं है। जब भी ऐसे विचार आयें तो एक बार उनके बारे में भी सोच लो जो आपको प्यार करते हैं, सिर्फ उसके बारे सोचना जिसे हम प्यार करते हैं, स्वार्थ है प्यार नहीं!
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