ओह! वेदप्रकाश शर्मा नहीं रहे...


वेेद प्रकाश शर्मा को तो हम भूल ही गए थे...। आज जब उनके निधन की जानकारी हुई तो अचानक उनके साथ उनके उपन्यासों के नाम, किरदार दिमाग में एक-एक कर सामने आने लगे। धुंधली पड़ रही यादों से धूल की परत हटती गई और हम सालों पीछे की दुनिया में एक बार फिर जीने लग गए...।

     हमारा बचपन ऐसा नहीं था, जब हमें पढ़ने के दौरान कुछ भी पढ़ने की आजादी हो। पाठ्यक्रम की किताबों से इतर कुछ भी पढ़ना बुरा माना जाता था, तब ऐसी किताबें छुपकर पढ़ी तो जाती ही थी, छुपकर ही खरीदनी या दोस्तों से लेनी भी होती थी। कॉमिक्स हो या नॉवेल सिर्फ छुपकर ही पढ़े जा सकते थे। जाहिर सी बात है कि ऐसी बुक्स खरीदने के लिए घर से तो पैसे नहीं ही मिल सकते थे और मार्केट में दूसरी किताबें अच्छा साहित्य के चलते नहीं, बल्कि अच्छा और बड़ा नाम होने के चलते अधिक मूल्य में मिलती थीं। तब बस वेद ही थे जो पॉकेट खर्च में आ जाते थे। पटना के गांधी मैदान के पास तो वे रद्दी के भाव में मिल जाते थे, 5-10 रुपए में। उनकी इसी सर्व सुलभता से खुद को बड़ा साहित्यकार कहने वाले चिढ़ते थे। लेकिन चूंकि वेद सबसे अधिक सुलभ थे इसलिए सबसे अधिक पढ़े गए। हमने भी उन्हें खूब पढ़ा। कहने में संकोच नहीं कि हिंदी की जो थोड़ी-बहुत जानकारी मेरे पास है, इसमें काफी योगदान उनके नॉवेल का भी है। उनके उपन्यासों को लुग्दी, घटिया साहित्य या फिर साहित्य भी नहीं मानने वालों के साहित्य तो तब हाथ लगे जब पॉकेट बड़ी हुई, छोटी पॉकेट में मोटी नॉवेल पढ़ाने वाले वेद ही थे। अब समझ में आता है साहित्यकारों की इस साहित्यकार से कुंठा। इस दौर में जब तमाम जतन, प्रचार-प्रसार करने के बाद भी कुछ बड़े साहित्यकारों की गिनती की प्रतियां बिक पाती हैं, वेद के एक ही नॉवेल की आठ करोड़ प्रतियां बिक गईं, दर्द भला कैसे न हो! ऐसे साहित्यकारों का वेद से डरना और दूसरों को डराना स्वाभाविक है।

     मेरा मानना है कि मेरी ही हिंदी नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य के विस्तार में वेद प्रकाश का बड़ा योगदान है, रहेगा...। ये बड़े नाम वाले इसे माने या न माने।

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