धत... तुम इसे प्यार कहते हो!
आज वैलेंटाइन डे है, अब बताने की जरूरत नहीं रही है। और यह भी नहीं कि यह वैलेंटाइन है क्या? हम तो यह समझना चाहते हैं कि किस डे, हग डे, प्रॉमिस डे..., ये जो इतने डे हैं, इन्हें हम कैसे तय करते हैं? हां, सबके जीवन में एक दिन ऐसा आता है जब वह अपने प्रेम का इजहार करता है, लेकिन यह सबके लिए एक ही दिन निश्चित कैसे किया जा सकता है? सबके लिए एक वैलेंटाइन है लेकिन वह 14 फरवरी ही हो, यह जरूरी तो नहीं? यह प्रेम कोई समारोह तो नहीं, जो देखादेखी मना लिया? प्रेम बाहरी नहीं आंतरिक दुनिया है, यह अंतर्मन से ही होगा और इसका चयन आप नहीं कर सकते कि आपके अंतर्मन में प्रेम का प्रस्फुटन कब होगा। जब आप चाहेंगे तभी आपको प्रेम हो जाये, जिसे चाहें उसे आपसे हो जाये, यह कदापि संभव नहीं है। ना... ना..., प्रेम करने के दिन का चयन आप नहीं कर सकते। जब आपके जीवन में प्रेम होगा तो वह इजहार—ए—मोहब्बत के दिन भी खुद ही तय कर देगा।
सोचिए, कि आपके अंदर अभी प्रेम जागा नहीं और दिन तय है कि आज ही इजहार कर देना है, कैसे करेंगे? वादा निभाने का मन नहीं, कूबत भी नहीं रखते और प्रॉमिस डे मनाना भी है? कैसे होगा? अभी तक कोई मिली नहीं, या मिली तो जंची नहीं और आज ही वैलेंटाइन है, किसे बोल दें? मान लीजिए, आज किसी को बोल भी दें और वह मान भी जायें तो क्या यह रिश्ता निभ जायेगा? किसी से प्यार हो जाये तो निगाहें बात कर लेती हैं, जज्बात बोल पड़ते हैं, आपके दिल की धड़कनें उसे आपके प्यार का अहसास दिला देती हैं, आपकी आंखों में उसका अक्स उभर जाता है, बिन बोले इजहार हो जाता है, दिन—वक्त कौन तय करता है यार, यह तो खुदी हो जाता है। हां, यदि अंदर से प्रेम न हो तो आप जुबां से इजहार कर भी दें और बात उस तक पहुंच भी जाये तो क्या? प्रेम में यह हड़बड़ी उसे हमेशा अधूरी ही बनाये रखेगी।
इसी तरह के देखादेखी प्रेम के नतीजे कल तक हमें चौंका रहे थे, अब तो इतने भरे पड़े हैं कि चौंकाते भी नहीं। ... एक युवक युवती एक—दूसरे से फेसबुक पर मिलते हैं। होटल बुक कराते हैं, वहां पहुंचते हैं तो पति—पत्नी निकल जाते हैं। किसी प्रेम की तलाश में होटल आये थे? अब तक कौन—सा प्रेम कर रहे थे? क्या प्रेम ही कर भी रहे थे? ... गोरखपुर की ही बात है। एक महिला फेसबुक पर किसी से मिलती है। उसे अपने कमरे में बुलाती है। उसके साथ मिलकर बगल के कमरे में सो रहे पति और अपने ही बेटे का कत्ल कर देती है। दोबारा अपने कमरे में आकर प्रेमी के साथ सेक्स करती है। कैसा प्रेमी, कैसी प्रेमिका और कैसा प्यार...? दिल्ली में एक लड़का एक लड़की से प्यार करता है। घर वालों को नहीं बताता और घर वाले उसकी शादी कहीं और तय कर देते हैं। अपनी प्रेमिका का कत्ल कर लाश कमरे में छुपा देता है। नई नवेली पत्नी के साथ उसी कमरे में सुहागरात मनाता है। जाहिर है प्रेमिका की लाश उसी कमरे में पड़ी हुई है। कौन—सा प्यार है भाई?
बाजार ने आपके सेक्स की भूख से मिलकर यह जो नया प्रेम गढ़ा है, यह आपको किस दुनिया में ले जा रहा है, इसकी भनक आपको भी नहीं है। यह प्यार—वार नहीं है भाई, बस इसे हवस कहने से लौंडों—लौंडियों की फटती है, इसलिए प्यार का नाम दे देते हैं। ठीक उसी तरह, जैसे जेएनयू में बैठकर इस समय राहुल गांधी देश द्रोह की गतिविधि को अभिव्यक्ति की आजादी बता रहे हैं। यह भी उसी पीढ़ी से आते हैं इसलिए कोई आश्चर्य नहीं। भारत मुर्दाबाद को जैसे इस समय अभिव्यक्ति की आजादी की ओट मिल रही है, आने वाले दिनों में बलात्कार को आनंद की आजादी कही जाये तो आश्चर्य न करना! ... अरे भाई, अभी इतने भी समझदार न हुए कि देश प्रेम, देश द्रोह और अभिव्यक्ति की आजादी का फर्क समझ पाओ, क्या इतनी भी भावनाए नहीं कि सेक्स और प्रेम को अलग कर पाओ? प्रेम भावनात्मक, आध्यात्मिक होता है, वह शारीरिक भी हो सकता है लेकिन जो केवल शारीरिक हो वह सेक्स, हवस होता है, वह प्रेम नहीं हो सकता। प्रेम में मर्यादा और जिम्मेदारी तो होनी ही चाहिए। वह चाहे देश से प्रेम हो या माशूका से। यह सिर्फ मजा नहीं है कि जब मन किया प्रेम किया, जब मन किया मुर्दाबाद कह दिया। इसके साथ जिम्मेदारी भी है। प्रेम को समझें और सिर्फ प्रेम करें। या, फिर जो करते हैं उसे स्वीकार लें, उसे प्रेम का नाम देकर प्रेम को बदनाम न करें।

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