केरल की ज्योति से प्रकाशित सारण के गांव
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| SISTER JYOTI |
सारण के गांव इस समय अभाव के अंधेरे पर विजय प्राप्त कर स्वावलंबन की ज्योति से प्रकाशित हैं। यह ज्योति केरल से प्रस्फुटित होकर बिहार के गांवों को रौशन कर रही है। दरअसल, केरल में 15 नवंबर 1943 को जन्मी ज्योति ने बिहार के सारण जिले की आधी आबादी को पूरी ताकत प्रदान की है जीवन के अभावों से संघर्ष करने की और उस पर विजय प्राप्त करने की। अभी उनकी प्रेरणा से जिले की 1400 महिलाएं पूरी तरह आत्मनिर्भर हैं और खुद के बलबूते अपने व परिवार का भरण-पोषण कर रही हैं।
केरल के इदूकी जिले के तोरूपुला गांव निवासी मिस्टर जाॅन व एली की सबसे छोटी संतान ज्योति ने 1962 में मैट्रिक करने के बाद नर्सिंग की ट्रेनिंग ली। रायपुर में मिशनरी अस्पताल में रोगियों की सेवा शुरू की और वहीं पीडि़त मानवता की सेवा की ललक जगी। एसएमएमआई संस्था से जुड़ गईं और अस्पताल छोड़ कर मेरठ आ गईं। हबतुआ गांव में दलित उत्थान का काम किया। वहां से मध्य प्रदेश के आदिवासियों के गांव चिंदबरा गईं। छह वर्षों तक उस गांव रहीं और महिलाओं को शिक्षित किया। बच्चों को स्कूल पहुंचाया और शराब बंदी का अभियान छेड़ आदिवासियों को मानव बनाया।
सिस्टर ज्योति वर्ष 2001 में छपरा पहुंची। गड़खा व सदर प्रखंड को अपना कार्य क्षेत्र चुना और यहां की दलित बस्तियों में काम करना शुरू किया। नरांव, शिवरहियां व अन्य बस्तियों के पुरूष, महिला व बचें के हालात देख वे द्रवित हो उठीं। उन्होंने ठान ली कि इनका जीवन बदल कर रहेंगी और अभियान में जुट गईं।
सिस्टर ने जब काम करना शुरू किया तो उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा। किसी ने उन्हें दलितों को इसाई बनाने का दुष्प्रचार किया तो किसी ने उन्हें खाने-पकाने वाली महिला कहा, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपने काम में लगी रहीं। एक-एक कर लोग जुड़ते गए और कारवां खड़ा होता गया। केवल महिलाएं ही नहीं, बल्कि क्षेत्र के पुरूष भी उन्हें आज सिस्टर ज्योति के नाम से पुकारते हैं, जिनकी बदौलत उनकी दुनिया रोशन हो गयी है। सारण में उनके आगमन के एक दशक बाद, आज 1400 से अधिक महिलाएं और उनके परिवारों का अर्थभाव का अंधेरा छट चुका है। सिस्टर ज्योति का मानना है कि किसी को मुफ्त में कुछ भी नहीं दिया जाना चाहिए। सिस्टर ज्योति बस इतना ही चाहती हैं कि प्रत्येक गरीब, असहाय, शोषित व्यक्ति समाज की मुख्य धारा में शामिल हो जाए।

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