... आखिरकार शराब पी, रुपये ले और मुर्गा खा ही हुई वोटिंग
बिहार में नगर निकाय का चुनाव विगत 17 जून को संपन्न हो गया। 19 को मतगणना हुई और जो परिणाम आए उसने साबित कर दिया कि जनता को मूर्ख बनाना कितना आसान है, और यह भी कि आज के नेता कितने चालाक हैं। चुनाव के पूर्व अपने वार्ड के पार्षदों को गाली देने वाले मतदाताओं ने ही उन्हें अपना बहुमूल्य मत दिया और जिताया भी। गजब का विरोधाभास है, लेकिन है बिल्कुल सच। गाली भी उन्हें, और वोट भी उन्हीं को...।
छपरा नगर परिषद में कुल 44 वार्ड हैं। इन 44 वार्डों में 33 सीटों पर निवर्तमान पार्षदों का ही कब्जा रहा है। यानी, सिर्फ 11 सीटों पर नए चेहरों को मौका मिला है। हैरान करने वाली बात है कि जिन वार्डों में पिछले कार्यकाल में जनता तबाह रही, नाले जाम रहे, नालों का पानी सड.कों पर बहता रहा, मुहल्ले गंदगी से पटे रहे, पीने के लिए स्वच्छ जल नसीब नहीं हुआ, राशन-किरासन के लिए तरसते रहे, आरोप-प्रत्यारोप चलते रहे, एक-दूसरे से अपना दर्द बता मुहल्लेवासी पार्षदों को भला-बुरा कहते रहे, उन्हें गालियां बकते रहे..., उन वार्डों में फिर वही काबिज हुए, जिनके लेकर शिकायतें थीं। यदि मत का आधार विकास रहा होता तो फिर तस्वीर बिल्कुल उलट होती, लेकिन यहां तो मत का आधार वही रहा- मुर्गा, शराब रुपया और जाति। नगर निकाय के चुनाव ने रुपया को जाति से भी बड़ा साबित किया और मतदाताओं ने मुर्गा खा, शराब पी और रुपये लेकर किसी के भी पक्ष में मतदान कर दिया। उन्हें इससे इत्तेफाक नहीं रहा कि वे पिछले पांच सालों में किस पीड़ा को झेलते रहे, किन परेशानियों से दो-चार होते रहे और यह भी याद नहीं रहा कि उनकी शिकायतें कोई नहीं सुनता था। जनता की इस शार्ट टर्म मेमोरी ने प्रत्याशियों का काम आसान कर दिया और वोट के एक दिन पूर्व वार्डों में जमकर रुपये बांटे गए। दावतों का दौर तो सप्ताह-पखवारे पूर्व से चल रहा था। पाउच की शराब पीने वाले अंग्रेजी का लुत्फ उठा रहे थे तो जिन्हें ठीक से दाल-रोटी नसीब नहीं होती थी, उन्हें मुर्गा-भात से कम पर मंजूर नहीं था। प्रत्याशियों ने भी इस आसान सी शर्त को पूरा करने में देर नहीं की और परिणाम सामने है। जिनसे शिकायत थी, प्रजा ने फिर उन्हें ही राजा बनाया है..। वाह लोकतंत्र, वाह, बहूत खूब।
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