भारतीय गणतंत्र दिवस : बहुत दिन नहीं हुए, कितना बदल गए हैं हम...।


हम बहुत ज्‍यादा दिन के तो नहीं हुए लेकिन तब और अब में फर्क बहुत ज्‍यादा हो गया है। आज 26 जनवरी है। तारीख ही काफी है। गणतंत्र दिवस या रिपब्लिक डे नहीं जानने वालों के लिए भी यह तारीख खास होती थी। हमारे गांव में ऐसा लगता जैसे कोई पर्व हो। गांव के चौक पर भी तिरंगा फहराया जाता, गांव के लोग तिरंगे को सैल्‍यूट करते, जिलेबियां बटती। जन-गण-मन, वंदेमातरम की ध्‍वनि फिजां में तो दिसंबर से ही गुंजने लगती। जिनके घर के बच्‍चे स्‍कूल में पढ़ते उनके घर तो लगता कि जैसे पूरा घर ही 26 जनवरी पर कार्यक्रम में भाग लेने वाला है। हमें याद है जब हम प्राइमरी में पढ़ते थे तो कैसे राष्‍ट्रगीत याद करते। हम याद करते, स्‍कूल में प्रोग्राम हमें देना होता था लेकिन चिंता सबको रहती। मेरी अम्‍मा को देखकर नहीं लगता कि वे बड़ी हैं। वे भी छोटी बन जातीं। जो भी बाहर से घर में घुसता, उसकी जुबां पे कोई राष्‍ट्रगीत मचल रहा होता। रेडियो पर भी फरमाइशी गानों में सबसे अधिक राष्‍ट्रगीत ही सुने जाते। अम्‍मा, पापाजी, सभी ऐसे सहयोग करते जैसे उनका बेटा कितना महत्‍वपूर्ण कार्यक्रम देने जा रहा हो। पुरस्‍कार की तो बात ही नहीं होती। कार्यक्रम के बाद इनाम के तौर पर मिलने वाली पेंसिल, कापी लेकर ऐसा लगता जैसे कोई जंग जीतकर मेडल पाया हो। घर आने पर भी कुछ वैसा ही जोरदार स्‍वागत। सभी पूछते क्‍या हुआ, कैसा?
मेरा गांव अब भी वही है। मेरा घर भी वही है। लोग भी वही हैं लेकिन कुछ भी वह नहीं जो तब था। मकर संक्रांति में घर गया था। कुछ नए अनुभव हुए। तब हम गांव के गर्वमेंट स्‍कूल में पढ़ने जाते थे अब गांव में ही मेरे चाचाजी ने एक प्राइवेट स्‍कूल खोल दिया है। गर्वमेंट स्‍कूल की पढ़ाई की हालत यह है कि वहां खिचड़ी, पोशाक, किताबें सबकुछ मुफ़त मिलने पर भी लोग अपने बच्‍चे नहीं भेजते। सरकारी स्‍कूल में तो कोई फी भी नहीं और इस निजी स्‍कूल की फी 75 से 150 रुपये तक। फिर भी स्‍कूल में बच्‍चों की संख्‍या देखकर लग जाता है कि लोग खिचड़ी और पोशाक के लिए नहीं, पढ़ाई के लिए अपने बच्‍चों को स्‍कूल भेजते हैं। शायद यह बात अपनी सरकार आज तक नहीं समझ पाई। खैर, हम अब सिर्फ राष्‍ट्रभावना की बात कर रहे हैं। मेरे घर की छत से ही यह निजी स्‍कूल दिखता है। स्‍कूल में रोज बच्‍चे 26 जनवरी के प्रोग्राम को लेकर तैयारी में जुटे नजर आ रहे थे। ये तो अच्‍छी बात थी लेकिन यह बात हैरान करने वाली थी कि वहां सिर्फ बच्‍चे और टीचर थे। जब हम अपने स्‍कूल में ऐसा कर रहे होते तो राहगीर ठिठक जाते थे। गांव के प्रधान, सरपंच और अन्‍य लोग प्रतिदिन आकर बैठते, कार्यक्रम देखते, हमारे साथ राष्‍ट्रगान का उच्‍चारण करते। कितनी बड़ी बात हो गई है। 26 जनवरी मनाने की पूरी जिम्‍मेवारी सिर्फ इन बच्‍चों को दे दी गयी है। बाकी लोगों के लिए तो यह सिर्फ छुटटी का दिन बनकर रह गया है।
पिछले गणतंत्र दिवस की बात याद आ रही है। छपरा के दाउदपुर स्‍टेशन पर स्‍टेशन मास्‍टर ने नाले का गंदा पाने बहने वाले पाइप में झंडा फहरा दिया। किसी एक स्‍कूल में प्रिंसिपल ने उल्‍टा ही तिरंगा फहरा दिया। एक सरकारी कार्यालय में तो फटा झंडा ही फहरा दिया गया। एक पार्टी के कार्यालय में झंडा रात तक नहीं उतरा, दूसरे दिन भी फहरता रहा....। ऐसे अनेक दृश्‍य थे जो पहले हमने न कभी देखा था और न सुना था। सरकारी अफसर झंडा फहराने के नाम से ऐसा भागते हैं जैसे उन्‍हें कोई दंड मिला हो। जिन कार्यालयों पर मीडिया की नजर रहती है, पब्लिक की नजर रहती है, वहां तो अधिकारी रहते हैं, खुद झंडा फहराते हैं लेकिन बाकी कार्यालयों के अधिकारी अपना यह अहम कार्य आदेशपाल या दूसरे कर्मियों पर छोड़ देते हैं। झंडा फहराना राष्‍ट्रभक्ति से नहीं, बल्कि कार्रवाई के डर से होता है। ऐसी तुच्‍छ भावना तो पहले कभी नहीं थी। सचमुच हम बहुत बदल गए हैं...। 

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