रामदेव का राजनीतिक योग या निगमानंद का त्याग?
ब्रह़मलीन निगमानंद से हमें ढ़ेर सारा ज्ञान हुआ है। अब तक हम इसी मुगालते में थे कि धर्म बड़ा है, राजनीति ओछी चीज है। यह भी मानते थे कि धर्म से हर वर्ग जुड़ा है जबकि राजनीति से कुछ खास लोग। लेकिन, मेरा मुगालता तो दूर हुआ ही है, मेरा मानना भी अब गलत साबित हो गया है। दरअसल, बाबा रामदेव के कुछ दिनों के अनशन और निगमानंद के आमरण अनशन से बहुत बातें साफ हो गई है। बाबा रामदेव ने जिस अनशन को आमरण अनशन का नाम दिया था, वह चंद दिनों का रहा। जिस अनशन को मरने तक जारी रहने का दावा था वह शरीर में पानी की कमी पर जाकर टूट गया। लेकिन, दूसरी तरफ निगमानंद का अनशन। जब स्वामी निगमानंद अनशन पर बैठे तो शायद ही देश के हर कोने में यह खबर जा पायी हो। परंतु यह क्या? उनके त्याग की कहानी भी अखबारों के कॉलमों की मोहताज बन गयी। बाबा रामदेव के लिए अखबार के पन्ने कम पड़ रहे थे और निगमानंद के लिए पन्नों पर जगह तो बहुत था, लेकिन शब्द नहीं थे। लिहाजा, किसी ने दो कॉलम में निपटाया तो किसी ने....। सुना था कि त्याग व्यक्ति को भगवान की श्रेणी में खड़ा कर देता था, लेकिन यहां तो राजनीतिक योग के आगे त्याग की हार देखा हमने। अपार ज्ञान हुआ है इन दृश्यों से। एक और ज्ञान हमने अर्जित किया है, या कहें कि अर्जन हुआ है। योग तभी तक कारगर है जब तक कि किशमिश-बादाम, सेव-संतरे शरीर में जाते रहे, और योग ख्याति तब पाता है जब वह राजनीतिक हो। हमने देखा कि कैसे योग की बदौलत मृत्यु को भी कुछ देर के लिए टाल देने का दावा करने वाले कुछ दिनों में ही फलादार के बिना लाचार हो गए। हमने यह भी देखा कि किस तरह योग हिट हुआ। भारत में योग सदियों पुराना है लेकिन जब उसने राजनीति से गठजोड़ किया तो अपार ख्याति मिली। यानी कि सिर्फ योग से राजनीतिक योग बड़ी और असरदार चीज है। कहीं-कहीं हमें कुछ संदेह भी है। हालांकि अब दूर हो रहा है। निगमानंद किस योग की बदौलत इतने दिनों तक बिना कुछ खाये-पीये मृत्यु को टालते रहे थे? काश, वे होते और हमें यह जानकारी देते। लेकिन, सब कुछ के बावजूद हमारा यह ज्ञान सब जानकारियों पर भारी है कि जैसे भी हो, रामदेव का राजनीतिक योग निगमानंद के त्याग से बड़ा है।
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