जिम्मेवार कौन ?
गत 27 अप्रैल को धनबाद के कोल बोर्ट कालोनी, मटकुरिया में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई का विरोध कर रहे 4 नागरिकों की मौत का आखिर जिम्मेवार कौन है? मौत के बाद माहौल को नियंत्रित करने के लिए कफ़र्यू भी लग गया और हो सकता है कि मामले के शांत हो जाने के बाद प्रशासन अतिक्रमण हटाने में भी कामयाब हो जाए लेकिन सवाल यह उठता है कि ऐसी स्थिति उत्पन्न ही क्यो होती है? ऐसी स्थितियों के पनपने और फिर विकराल होने के पीछे किन जिम्मेदार अधिकारियों के हाथ हैं और क्या ऐसे लोग भी कभी सरकारी कार्रवाई की जद में आ सकेंगे? जवाब निश्चित ही ना है। क्योंकि अतिक्रमण के लिए हमेशा से ही असहाय नागरिकों को ही दोषी करार देने की प्रथा है, अपनी जिम्मेदारी के निर्वहन से विमुख हो ऐसी स्थितियों के प्रकट होने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को कभी नहीं। पिछले करीब एक सप्ताह से कफ़र्यू के कड़े नियमों के बीच पीस रहे नागरिकों का दोष क्या है? ऐसी स्थितियां फिर ना पनपे, इसके लिए आवश्यक है कि ऐसी स्थितियों के कारणों की पड़ताल की जाए और दोषी पदाधिकारियों को भी कार्रवाई के दायरे में लाया जाए।
सूबे के सारण जिले को ही ले लें। शहर में रोज जाम लगता है। आज ही जाम के कारण स्नातक के कई परीक्षार्थियों की परीक्षा छूट गई। फिर भी जाम के लिए कोई कारगर उपाय नहीं और इसका एक ही कारण है सड़कों का अतिक्रमण। लेकिन, इस जाम से यहां के पदाधिकारियों को कोई अधिक दिक्कत नहीं, लिहाजा रास्ता नहीं निकल रहा। ऐसे पदाधिकारी, बड़े नेता यदि जाम में फंसते हैं तो गाड़ी से डंडा लिए गार्ड उतरते हैं और आड़े-तिरछे खड़ी वाहनों के चालकों को पीट-पाटकर उनके लिए रास्ता निकाल लेते हैं लेकिन जाम में फंसे अन्य लोगों के लिए कोई उपाय नहीं किया जाता। यही अतिक्रमण जब नासूर बन जाता है तब पुलिस गोली चलाने से भी गुरेज नहीं करती। शायद प्रशासन को अस्थायी अतिक्रमण हटाना ज्यादा मुश्किल लगता है और यही अस्थायी अतिक्रमण जब स्थायी बन जाता है, तब गोली चलाना उनके लिए ज्यादा आसान काम लगता है। कोई भी अतिक्रमण एकाएक स्थायी नहीं होता, कहीं भी सड़क के किनारे एकाएक इमारत नहीं खड़ी हो जाती। पर, अधिकारी तो घाव के नासूर बन जाने का इंतजार करते हैं और फिर अचानक ऑपरेशन पर ही उतारू हो जाते हैं। सरकार को अपने नागरिकों की मौत से सीख लेनी चाहिए और आगे ऐसी नौबत न आने देने पर विचार करना चाहिए।
सूबे के सारण जिले को ही ले लें। शहर में रोज जाम लगता है। आज ही जाम के कारण स्नातक के कई परीक्षार्थियों की परीक्षा छूट गई। फिर भी जाम के लिए कोई कारगर उपाय नहीं और इसका एक ही कारण है सड़कों का अतिक्रमण। लेकिन, इस जाम से यहां के पदाधिकारियों को कोई अधिक दिक्कत नहीं, लिहाजा रास्ता नहीं निकल रहा। ऐसे पदाधिकारी, बड़े नेता यदि जाम में फंसते हैं तो गाड़ी से डंडा लिए गार्ड उतरते हैं और आड़े-तिरछे खड़ी वाहनों के चालकों को पीट-पाटकर उनके लिए रास्ता निकाल लेते हैं लेकिन जाम में फंसे अन्य लोगों के लिए कोई उपाय नहीं किया जाता। यही अतिक्रमण जब नासूर बन जाता है तब पुलिस गोली चलाने से भी गुरेज नहीं करती। शायद प्रशासन को अस्थायी अतिक्रमण हटाना ज्यादा मुश्किल लगता है और यही अस्थायी अतिक्रमण जब स्थायी बन जाता है, तब गोली चलाना उनके लिए ज्यादा आसान काम लगता है। कोई भी अतिक्रमण एकाएक स्थायी नहीं होता, कहीं भी सड़क के किनारे एकाएक इमारत नहीं खड़ी हो जाती। पर, अधिकारी तो घाव के नासूर बन जाने का इंतजार करते हैं और फिर अचानक ऑपरेशन पर ही उतारू हो जाते हैं। सरकार को अपने नागरिकों की मौत से सीख लेनी चाहिए और आगे ऐसी नौबत न आने देने पर विचार करना चाहिए।
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