राजनीति के बाद शिक्षा जगत शर्मसार


 बिहार इन दिनों सुर्खियां बटोरने में देश के बड़े प्रदेशों की कतार में है। भ्रष्‍टाचार और नैतिक पतन की तरफ बढ़ रहा बिहार शायद अपनी गौरवशाली अतीत को धोने में लगा है। कुछ ही दिनों पहले रूपम पाठक नाम की शिक्षिका ने बिहार के कुछ राजनेताओं के चरित्र को उजागर किया था। अभी इस घटना को लोग ठीक से भूल भी नहीं सके थे कि नैतिक पतन की एक नई कहानी शिक्षा जगत में प्रकट हो गई। जयप्रकाश विश्‍वविद्यालय के कुलपति ने भोजपुरी की ख्‍यातिप्राप्‍त गायिका देवी के साथ छेड़खानी कर देश को बता दिया कि बिहार में कुलपति जैसे सम्‍मानित पद पर कैसे-कैसे लोग बिठाये जाते हैं। यही नहीं, पूर्व कुलपति पर भी गबन करने के मामले में एफआईआर दर्ज की गयी है। यह तो मात्र बिहार के जयप्रकाश विश्‍वविद्यालय की कहानी है, जबकि हकीकत यह है कि प्राय: सभी विश्‍वविद्यालयों के कुलपति इसी कतार में खड़े हैं।
मामला कुछ यूं है। 18 फरवरी को बिहार के बोधगया में एक स्‍वागत  समारोह था। इसमें सुविख्‍यात गायिका देवी भी कार्यक्रम प्रस्‍तुति के लिए आमंत्रित की गयी थीं। इसी कार्यक्रम में राजद विधायक सुरेन्‍द्र यादव व जयप्रकाश विश्‍वविद्यालय छपरा के कुलपति प्रो. (डा.) दिनेश प्रसाद सिन्‍हा भी आमंत्रित थे। बोधगया के संबोधित रिट्रीट में आयोजित इस वर-वधू स्‍वागत समारोह में जब देवी ने प्रस्‍तुति देनी शुरू की तो लोग झूम उठे। विधायक और कुलपति ने देवी से पसंदीदा गाने की फरमाईश की और जब उनकी फरमाइश पर देवी ने गाना शुरू किया तो उनके गीत व लटको-झटको पर मोहित डी.पी. सिन्‍हा अपना होश खो बैठे तथा उनके साथ बदतमीची करने लगे। देवी के साथ्‍ा मंच पर उन्‍होंने छेड़खानी शुरू कर दी। सूत्र बताते हैं कि देवी ने विरोध स्‍वरूप कुलपति पर एक चाटा भी जड़ा था। कुलपति द्वारा छेड़खानी किए जाने व देवी के विरोध के बाद वहां अफरातफरी मच गयी और इसका फायदा उठा देवी वहां से बच निकलीं। बताते हैं कि कुलपति के लोगों द्वारा उन्‍हें ढूंढने का भी प्रयास किया गया था। देवी ने अपने गृह शहर छपरा पहुंचकर अपने विश्‍वस्‍त लोगों को घटना की जानकारी दी। उन्‍हीं के सलाह पर उन्‍होंने छपरा की मीडिया और फिर पुलिस को 20 फरवरी को इन सारी बातों की जानकारी दी। देवी ने छपरा से ही गया एसएसपी विनय विनय कुमार से उक्‍त मामले की शिकायत फैक्‍स के द्वारा की। इधर, इस मामले के खुलासे के बाद देवी के पक्ष और कुलपति के विरोध में धरना-प्रदर्शन और आंदोलन शुरू हो गए। छपरा शहर में कुलपति के पुतले जलाये जाने लगे। इस बीच कुलपति खुद को निर्दोष बताते रहे। 22 फरवरी को छपरा के अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं ने जयप्रकाश विश्‍वविद्यालय के मुख्‍य गेट के समक्ष कुलपति के खिलाफ प्रदर्शन किया। शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन कर रहे अभाविप कार्यकर्ताओं पर कुछ लोगों द्वारा हमला बोला गया। हमला करने वाले लोग अपना चेहरा ढंके हुए थे। इन लोगों ने अभाविप कार्यकर्ताओं चरणदास, अवधेश कुमार, रीतेश कुमार आदि की जमकर पिटाई कर दी। वहां उपस्थित कुछ मीडियाकर्मियों को भी चोंटे आईं। घटना के बाद जख्‍मी अभाविप कार्यकर्ताओं को छपरा सदर अस्‍पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया गया। सदर अस्‍पताल में छपरा के एसडीओ विनय कुमार पांडेय भी कार्यकर्ताओं का हाल-चाल जानने पहुंचे। घटना में अभाविप के सह संयोजक चरणदास को गंभीर चोटे आई थीं और इस कारण उन्‍हें बेहतर इलाज के लिए पीएमसीएच रेफर कर दिया गया। रेफर होने से पूर्व छपरा सदर अस्‍पताल में मुफस्सिल थाना पुलिस को दिये अपने बयान में चरणदास ने घटना में कुलपति प्रो. डी.पी. सिन्‍हा, भगवान बाजार निवासी नवल सिंह, रणधीर यादव व रवीन्‍द्र यादव को आरोपी बनाया। पुलिस को चरणदास द्वारा दिये बयान में कहा गया कि कुलपति के इशारे पर उक्‍त तीन लोगों ने उनके साथ मारपीट की। इन लोगों ने लाठी-डंडे और गैर लाइसेंसी हथियारों का भी प्रयोग किया और इसमें विवि के सुरक्षा गार्डों ने भी इनका साथ दिया। जेपीविवि में अभाविप कार्यकर्ताओं की पिटाई के बाद मामले ने तूल पकड़ लिया। सभी प्रिंट और इलेक्‍ट्रानिक मीडिया ने इस खबर को प्रमुखता से प्रसारित किया, नतीजा हुआ कि मामले ने तूल पकड़ लिया। बखेड़ा बढ़ता देख कुलपति ने राजेन्‍द्र कालेज में दर्शनशास्‍त्र के व्‍याख्‍याता देवी के पिता प्रो. प्रमोद कुमार को‍ निलंबित कर दिया। कुलपति का कहना था कि प्रमोद के निलंबन का इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है, उनकी अनुशासनहीनता के कारण उन्‍हें 21 फरवरी को ही निलंबित किया गया है। लेकिन, लोग कुलपति की इस बात को पचा नहीं पा रहे थे। कारण कि यदि प्रो. प्रमोद को पहले ही निलंबित कर दिया गया था तो इसकी खबर मीडिया में बाद में क्‍यों आई? यही नहीं, इसकी सूचना डा. प्रमोद को क्‍यों नहीं दी गई? कुलपति के अनुसार, डा. प्रमोद बगैर छुट़टी लिए ही क्‍लास से गायब रहते थे। उनकी इस हरकत की जानकारी देते हुए राजेन्‍द्र कालेज के प्राचार्य डा. बैकुण्‍ठ पांडेय ने उन्‍हें निलंबित करने की सिफारिश कुलपति से की थी। इसके बाद उन्‍होंने मामले की जांच के लिए तीन सदस्‍यीय समिति गठित कर दी थी। समिति ने जांच की और आरोपों को सही पाया। समिति की रिपोर्ट के बाद कुलपति ने डा. प्रमोद को शो कॉज भी किया परंतु संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर उन्‍हें निलंबित करने की कार्रवाई की गई। इधर, जब डा. प्रमोद को निलंबित किया गया वे मेडिकल लीव पर मुम्‍बई में अपनी पत्‍नी का इलाज करा रहे थे। फोन पर वे बार-बार सफाई देते रहे कि उन्‍हें कोई शो कॉज नहीं किया गया है और ना ही निलंबन के बाद ही उन्‍हें इसकी जानकारी दी गयी है। इस बारे में विवि व शहर में चर्चा रही कि डा. प्रमोद के निलंबन का कारण देवी द्वारा वीसी पर लगाये गये आरोप हैं। दरअसल, देवी द्वारा लगाये गये आरोपों के बाद वीसी की काफी बेइज्‍जती हुई थी और मामला जोर पकड़ता जा रहा था। ऐसे में कुछ लोग वीसी और देवी के बीच मध्‍यस्‍तता में जुटे थे। ये लोग इस कोशिश में थे कि किसी तरह वीसी और देवी का मामला शांत हो जाये। कुछ लोग यह सब स्‍वेच्‍छा से कर रहे थे जबकि कुछ लोग कुलपति की तरफ से। लेकिन, देवी अपनी जिद पर अड़ी रहीं, लिहाजा समझौता नहीं हो सका। इसी बीच अभाविप कार्यकर्ताओं के साथ पिटाई भी हो गई। देवी के समर्थकों का आरोप था कि कुलपति ने समझौता नहीं होने के कारण आक्रोश में आकर बैक डेट में डा. प्रमोद का निलंबन किया है। मामले ने दो-तीन दिनों में ही इतना तूल पकड़ा कि विधान परिषद पहुंच गया। अभाविप कार्यकर्ताओं की पिटाई को ले सदस्‍यों ने जांच की मांग की। विधान परिषद में सदस्‍यों द्वारा सवाल उठाये जाने के बाद स्‍वयं मुख्‍यमंत्री को सफाई देनी पड़ी। मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि मामले को स्‍वयं  डीजीपी देख रहे हैं और दोषी कोई भी हो, कार्रवाई की जाएगी। मामले की जांच जोर-शोर से शुरू हो गई। देवी द्वारा भेजे गये फैक्‍स के आधार पर गया एसएसपी विनय कुमार ने ट्रेनी एसपी बाबू राम को तहकीकात का निर्देश दिया और रिपोर्ट में आरोपों को सही पाया। इसके बाद, जयप्रकाश विश्‍वविद्यालय छपरा के कुलपति दिनेश प्रसाद सिन्‍हा पर के विरुद़ध गायिका देवी को गलत नीयत से रोकने, गाली-गलौज, मारपीट और छेड़खानी के आरोप में भारतीय दंड विधान की संज्ञीय धाराओं के तहत बोधगया थाने में प्राथमिकी दर्ज की कर ली गयी। इसी दिन चरणदास द्वारा दिये बयान के आधार पर छपरा मुफस्सिल थाना में भी उन पर अभाविप कार्यकर्ताओं की पिटाई में संलिप्‍त रहने को ले एफआईआर दर्ज हुई। पुन: विधान परिषद में सदस्‍यों ने मामला उठाया। अभाविप कार्यकर्ताओं की पिटाई के साथ ही देवी के पिता डा. प्रमोद को निलंबित करने पर वीसी की निंदा की गई। विधान परिषद सदस्‍य नीरज कुमार ने देवी के पिता के निलंबन को ले कुलपति पर विशेषाधिकार हनन का आरोप लगाया। इसके बाद विधान परिषद सभापति ताराकांत झा ने मामले को विशेषाधिकार समिति को सौंप दी। इधर, मानव संसाधन विकास मंत्री पी.के. शाही ने कुलाधिपति से जेपीविवि के कार्यकारी कुलपति प्रो. डी.पी. सिन्‍हा को निलंबित करने की अनुशंसा कर दी। अनुशंसा के बाद यह तय माना जाने लगा कि आरोपी कुलपति को निलंबित कर दिया जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कुलपति पर दो-दो थानों में एफआईआर दर्ज होने, विधान परिषद में मामला उठने, विशेषाधिकार हनन का प्रस्‍ताव पारित होने और फिर सरकार द्वारा अनुशंसा किए जाने के बावजूद कुलपति का निलंबन न होना लोगों में चर्चा का विषय बन गया। दबी जुबान यह बात कही जाने लगी कि राजभवन इस मामले में पैसे का खेल खेल रहा है। इस दौरान, अभाविप के पूर्व राष्‍ट्रीय मंत्री व प्रदेश सह संगठन मंत्री रमाशंकर सिन्‍हा, प्रदेश सह मंत्री तनुज सौरभ, संगठन मंत्री विवेक कुमार, शोध छात्र संगठन के विश्‍वजीत सिंह चंदेल, राजीव सिंह उर्फ लालू सिंह, हरिमोहन सिंह पिंटू, विकास सिंह के साथ ही भोजपुरी युवा विकास मंच के सदस्‍य कुलपति के निलंबन की मांग करते रहे। शहर में उनके पुतले फूंके जाते रहे, समाचार पत्रों और टीवी चैनलों में खबरें प्रसारित होती रहीं लेकिन राजभवन द्वारा कुलपति का निलंबन नहीं किया गया। इधर, बढ़ते दबाव को देखते हुए वीसी की गिरफ़तारी को पुलिस द्वारा छापामारी शुरू कर दी गयी। इस कार्रवाई के बाद अपने बचाव में कुलपति डी.पी. सिन्‍हा ने तत्‍काल छपरा कोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दायर की। वीसी की ओर से दाखिल अग्रिम जमानत याचिका संख्‍या  299/11 पर बहस करते हुए लोक अभियोजक पुण्‍डरिक बिहारी सहाय और सूचक के अधिवक्‍त रविरंजन प्रसाद सिंह ने कोर्ट को बताया कि विश्‍वविद्यालय एक सार्वजनिक स्‍थल है और इस कारण मामला हरिजन अत्‍याचार अधिनियम का बनता है। बता दें कि सूचक चरणदास हरिजन जाति से आते हैं। इसके बाद, जिला जज विजय प्रकाश मिश्रा ने अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। लेकिन, उंची राजनीतिक पहुंच के कारण न तो कुलपति की गिरफ़तारी हो रही है और न ही उनका निलंबन।
वर्तमान कार्यकारी कुलपति डा. प्रो. दिनेश प्रसाद सिन्‍हा की कारगुजारियां जयप्रकाश विश्‍वविद्यालय के लिए कोई नई बात नहीं है। यहां के अधिकतर कुलपतियों की कहानी इसी तरह की रही है। वर्तमान कुलपति ने जहां छेड़खानी कर सुर्खियां पाई वही पूर्व कुलपति डा. प्रो. रामप्रवेश शर्मा ने अपने कार्यकाल में धांधली और गबन कर नए रिकार्ड कायम किए। 28 फरवरी को उनका यह रिकार्ड स्‍थानीय मुफस्सिल थाने में दर्ज कर लिया गया। पूर्व कुलपति डा. रामप्रवेश शर्मा पर जेपी विवि के कुलसचिव प्रो. विजय प्रताप कुमार द्वारा एक एफआईआर दर्ज कराई गई। दरअसल,  कुलपति डा. आरपी शर्मा पर लगातार आरोप लगने के बाद राजभवन के निर्देश पर उनका वित्‍तीय अधिकार उनके कार्यकाल के एक माह पूर्व ही सीज कर दिया गया था। इसके बावजूद, पूर्व वीसी ने करीब 75 लाख रुपये बगैर किसी अधिकार के ही खर्च कर दिए। इसमें वेतन मद के 16 लाख, विवि के परीक्षा मद के 50 लाख, फर्नीचर मद के 6 लाख के अलावे कई अन्‍य खर्चें शामिल हैं। पूर्व वीसी के अनियमितताओं की यह कहानी मुफस्सिल थाना में भादवि की दफा 409 व 420 के तहत दर्ज कर ली गयी है। इसके अलावा, पूर्व वीसी पर नियमों को ताक पर रख पैसे लेकर कर्मियों की बहाली करने का भी गंभीर आरोप है। फिलहाल, तहकीकात जारी है।
बिहार में विकास दर बढ़ने को लेकर अपनी ही पीठ थपथपा रही सरकार भ्रष्‍टाचार दर को छुपा रही है। वरना सच्‍चाई तो यह है कि विकास से अधिक भ्रष्‍टाचार दर बढ़ा है। जहां पहले राजनेता ही भ्रष्‍टाचार में संलिप्‍त थे वहीं अब शिक्षा के शीर्षथ पद पर बैठे शिक्षाविद भी इसमें गोते लगा रहे हैं। बिहार में तेजी से बढ़ रहे इस शैक्षिक जगत के भ्रष्‍टाचार के कारण न सिर्फ कुलपति जैसे पद की प्रतिष्‍ठा खत्‍म हो रही है, वरन राज्‍यपाल जैसे पद की भी गरिमा धूमिल हो रही है। बता दें कि, कुलपति डी.पी. सिन्‍हा पर आरोप तय हो जाने के बाद भी राजभवन द्वारा कार्रवाई नहीं किया जाना, राजभवन को भी संदेह के दायरे में लाता है। गया के एसएसपी ने कुलपति पर लगे छेड़खानी के आरोप को साबित कर दिया है जबकि अभाविप कार्यकर्ताओं की पिटाई मामले में भी उन पर एफआईआर दर्ज है। इसके बावजूद, वे पद पर शान से विराजमान है। उनके निलंबन को ले सरकार की अनुशंसा भी राजभवन अनसुनी कर रहा है। चर्चा है कि डी.पी. सिन्‍हा ने कुलपति बनने के बदले करीब 40 लाख रुपये दिये थे। इस आरोप में कितनी सच्‍चाई है, यह तहकीकात का विषय है लेकिन राजभवन द्वारा किया जा रहा आरोपी कार्यकारी कुलपति का बचाव, लोगों को इस बिंदु पर सोचने का मौका दे रहा है। सूत्र बताते हैं कि बिहार में कुलपति की नियुक्ति में जाति, पैसा, राजनीति सभी खेल खेले जा रहे हैं। कुछ प्रबुद़धजनों की तो राय है कि विश्‍वविद्यालय को राज्‍यपाल के अधिकार से अलग कर देना चाहिए तभी राज्‍यपाल जैसे पद की गरिमा बची रह सकती है। ऐसे कुछ आरोपी कुलपतियों के कुलाधिपति जैसा गरिमा लिए पद पर भी आरोपित-कलंकित हो रहा है। इन आरोपियों को शह देने के कारण ही दिन-ब-दिन भ्रष्‍टाचार बढ़ता जा रहा है। यदि शिक्षा जगत में तेजी से फैल रहे इस भ्रष्‍टाचार पर अंकुश लगाना है तो ऐसे लोगों पर त्‍वरित कार्रवाई का नियम अपनाना ही होगा, वरना यदि यही स्थिति रही तो कुछ दिनों में कुलपति व कुलाधिपति जैसे पद की गरिमा बचानी मुश्किल होगी।

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