रूपम मामला : राजनीतिज्ञों के हवस की कहानी
बिहार में रूपम पाठक ने जो कदम उठाया है उसने बिहार के राजनीतिक नक्षत्र में पाक-साफ बनकर छाये रहे कुछ हवस के भेडि़यों के असली चरित्र को आम नजरों के सामने ला दिया है। इस घटना ने अच्छे चरित्र का ढिंढोरा पीटकर अपनी राजनीति चमकाने वाली भाजपा के उन चेहरों को भी जगजाहिर कर दिया है जो अब तक चरित्रवान बनने का अपना ढोंग जनता में विश्वास के रूप में बदलने के करीब पहुंच चुके थे। बता दें कि, रूपम के मामले को दबाने में शुरू से ही बिहार भाजपा के अदने कार्यकर्ता से लेकर शीर्ष नेता तक लगे रहे। इसमें यह भी आशंका जाहिर की जा रही है कि विधायक के अलावा अन्य नेताओं ने भी रूपम का दैहिक शोषण किया हो। यदि नहीं किया तो उनकी संलिप्तता तो रही ही जो लगातार इस मामले में 'बड़ों' के हस्तक्षेप से स्पष्ट हो जाता है। रूपम का थाने में एफआईआर दर्ज कराना, पुन: 164 के बयान में पलट जाना, पुन: रूपम का प्रोटेस्ट पेटीशन, एफआईआर पर कोई कार्रवाई न होना, भाजपा के शीर्ष नेता व सूबे के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी द्वारा सार्वजनिक मंच से विधायक को क्लीन चीट देना, पत्रकार नवलेश का रूपम के 164 के बयान को न मानने का अनुरोध, नवलेश की पत्नी रमा की रूपम के पुत्री को लेकर चिंतित होने की बात... सवाल दर सवाल खड़े करते हैं तो यह भी बताते हैं कि बात रूपम से आगे भी कुछ और थी। शायद, असली मामला रूपम के यौन शोषण से अलग हटकर उसकी 18 वर्षीय पुत्री से जुड़ा है। मामले को समझने के लिए एक बार मामले की तह से तहकीकात जरूरी है...।
18 अप्रैल 2010 को रूपम पाठक ने हाट थाने में एफआईआर दर्ज करायी और पूर्णिया के भाजपा विधायक राजकिशोर केसरी और विपिन राय के खिलाफ यौन शोषण का आरोप लगाया। इस बीच पूरे दो माह बीतने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। मामले को ऐसे दबा दिया गया, जैसे कुछ हुआ ही न हो। विधायक जैसे पद पर यौन शोषण के छींटे पड़े और फिर भी चुप्पी छायी रही। बता दें कि सूबे में सरकार भी भाजपा-जदयू की ही है, ऐसे में भाजपा विधायक पर कार्रवाई न होना चौंकाने वाली बात भी नहीं। एफआईआर दर्ज कराने के ठीक दो माह बाद पुन: इसी तारीख यानी 18 जून 2010 को मजिस्ट्रेट के समक्ष रूपम ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 का बयान दर्ज कराया और एफआईआर वाली बातों से मुकर गयी। मजिस्ट्रेट के सामने रूपम का मुकर जाना कई सवाल खड़े करता है। दो महीनों के अंदर थाने द्वारा कोई कार्रवाई नहीं होना अभियुक्त की ताकत बयां कर देता है, ऐसे में रूपम का अपने ही बयान से मुकर जाने की उसकी विवशता को अच्छी तरह समझा जा सकता है। जिस अभियुक्त के विरुदध थाना पुलिस कार्रवाई से बचती रही हो, जाहिर सी बात है कि उससे लड़ना रूपम के लिए आसान नहीं था। विधायक की हत्या व रूपम की गिरफ़तारी के बाद आये रूपम की मां कुमुद पाठक का बयान भी 164 के बयान के पीछे की कहानी बयां करने के लिए काफी है। रूपम की मां के अनुसार, अभियुक्तों द्वारा मुकदमा वापस नहीं लेने पर रूपम के बेटा व बेटी को उठा लिये जाने की धमकी दी गयी थी। बता दें कि रूपम की पुत्री की उम्र 18 वर्ष है, यानी वह उम्र, जब हवस के भेडि़यों की नजर किसी स्त्री जाति पर जाती है। एक स्त्री होने के नाते रूपम भी इस बात को समझती थी। साथ ही एक मां होने के नाते वह अपने पुत्र और पुत्री को इन दरिंदों के हाथ नहीं आने देना चाहती थी। और शायद इसीलिए, पुलिसिया कार्रवाई से निराश और ममता से विवश होकर मां रूपम ने अपना आरोप वापस ले लिया। यहां यह भी गौर करने वाली बात है कि इसके ठीक बाद पत्रकार नवलेश पाठक ने कोर्ट में एक प्रोटेस्ट पिटिशन लगाई जिसमें न्यायालय से मुकदमे को खारिज नहीं करने व रूपम के 164 के बयान को रद़द करने की गुहार लगायी थी। अब तक की पुलिसिया कार्रवाई पर नजर डालें तो यह तो स्पष्ट हो ही गया है कि नवलेश रूपम का शुभचिंतक है। नवलेश की पत्नी रमा पाठक का रूपम के स्कूल- राजहंस पब्लिक स्कूल में पढ़ाना, हत्या के पूर्व रूपम की नवलेश से बातचीत व दोनों का एक साथ देखा जाना... सबकुछ यह बताता है कि नवलेश हर कदम रूपम के साथ था। ऐसा वह सिर्फ एक पत्रकार होने के नाते नहीं कर सकता था। रूपम से उसके पारिवारिक रिश्ते थे और इस नाते रूपम की परेशानियों से भी वह दो-चार था। ऐसे में नवलेश का रूपम के विरुद़ध जाना कोई दूसरी ही कहानी कहता है। यानी, नवलेश को पता था कि रूपम दबाव में आकर बयान बदल रही है और इसलिए उसके हित में नवलेश ने प्रोटेस्ट पिटिशन लगाई, वरना जब नवलेश हर कदम पर रूपम के साथ था तो इस निर्णय में विरोध क्यों? और एक बार को यदि यह भी मान लें कि यहां तक आते-आते रूपम और नवलेश में झगड़ा हो गया था तो फिर हत्या में नवलेश रूपम का सहयोगी कैसे बना ? मतलब साफ है कि नवलेश ने मुकदमे को खारिज न करने की गुहार रूपम का विरोध करने के लिए नहीं बल्कि उसके हित में लगायी थी।
रूपम द्वारा आरोप वापस लेने के बाद इसे आधार बनाते हुए पुलिस ने 7 सितम्बर 2010 को इस मामले में अपनी फाइनल रिपोर्ट(आरोप पत्र संख्या- 185/10, दिनांक 31 अगस्त) दाखिल कर दी। लेकिन, इसके एक पखवारे बाद ही 16 सितम्बर 2010 को रूपम ने फिर न्यायिक दंडाधिकारी के यहां प्रोटेस्ट पेटीशन दाखिल की। जिसमें उसने अपने एफआईआर वाले बयान को दोहराया। पेटीशन में रूपम ने कहा था कि विधायक और उसके गुर्गे विपिन राय लगातार उसका यौन शोषण कर रहे हैं। इस मामले में सुनवाई की तारीख 25 मार्च 2011 रख दी गयी। लेकिन, इतना लंबा इंतजार रूपम के लिए और भी भारी पड़ने वाला था। इस बीच अब मामला न्यायालय में होने का बहाना कर पुलिस का शांत बैठ जाना भी लाजिमी था। जो पुलिस एफआईआर दर्ज होने के बाद कोई कार्रवाई नहीं की हो, वह उस मामले में कोई कार्रवाई क्यों करें जिसमें वह फाइनल रिपोर्ट दे चुकी हो और वह भी तब जब मामला न्यायालय के पाले चला गया हो? लापरवाह पुलिस को तो बहाना चाहिए था, वह उसे मिल गया था और वह भी लंबे समय के लिए। वरना पुलिस चाहती तो विशेष जांच कर सकती थी। इसे पुलिस स्वीकार भी चुकी है कि उसे इसका अधिकार है। इसमें यह भी विचारणीय है कि जिन लोगों ने दो माह के अंदर ही दबाव देकर रूपम के एफआईआर को बदलवाने में कामयाबी पा ली, वे लोग इन छह महीनों में क्या-क्या नहीं कर सकते थे? और उन्होंने किया भी। यदि नहीं किया होता तो रूपम को एक स्कूल संचालिका से हत्यारिन बनने का कोई भूत तो सवार नहीं ही था?
रूपम को विधायक की हत्या पर मजबूर करने वाले और भी कई कारण दिखते हैं। यहां यह बता दें कि विधायक पर आरोप लगने के बाद सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उनसे कन्नी काटने लगे थे। जिसका जीता-जागता उदाहरण पूर्णिया के एक समारोह में दिखा। उक्त समारोह में विधायक राजकिशोर केशरी मंच पर बैठे थे। जब नीतीश कुमार मंच की ओर बढ़े और उनकी नजर विधायक पर पड़ी तो उनके कदम रूक गए थे। इशारा समझते हुए गार्ड ने विधायक को मंच से नीचे उतारा था और तब मुख्यमंत्री ने मंच पर संबोधन किया। सिर्फ रूपम के आरोपों के कारण तो नीतीश सत्ता में सहयोग करने वाले राजकिशोर से खफा नहीं ही हो सकते थे, इन आरोपों में छिपी कुछ सच्चाई ने उन्हें ऐसा होने पर विवश किया था। यह भी काबिले गौर है कि भाजपा के शीर्ष नेता शुरू से ही अपने विधायक का बचाव करते रहे। शायद, यह बात भी मुख्यमंत्री को नागवार गुजरी थी लेकिन पार्टी से जुड़ा मामला समझकर शायद उन्होंने चुप्पी साध लेना ही बेहतर समझा। सूबे के उप मुख्यमंत्री व बिहार भाजपा के शीर्ष नेता सुशील कुमार मोदी द्वारा विधायक को सार्वजनिक मंच से क्लीन चीट देना भी बहुत कुछ कहता है। एफआईआर दर्ज होने के बाद उपमुख्यमंत्री ने एक समारोह में खुले मंच से विधायक राजकिशोर केसरी को यौन शोषण के आरोपों से बरी कर दिया। सभी जानते हैं कि एक उपमुख्यमंत्री की ताकत क्या होती है। जिस अभियुक्त की वकालत स्वयं उपमुख्यमंत्री कर रहे हों, उस तक पुलिस का हाथ पहुंचे भी तो कैसे? यहां एक तरह से मोदी ने पुलिसिया कार्रवाई को अपने बयानों से प्रभावित करने का काम कर दिया। रूपम के लिए इससे बड़ी निराशा की बात और कुछ नहीं हो सकती थी। वह जान चुकी थी कि अब राजकिशोर व उसके गुर्गों से निपटने के लिए कानून का रास्ता लगभग बंद हो चुका था। कम से कम थाने के दरवाजे तो बंद ही हो चुके थे। हां, न्यायालय पर अब भी विश्वास था। लेकिन न्यायालय द्वारा दी गयी लंबी तारीख का फायदा उठा दरिंदों ने एक बार फिर उसका यौन व मानसिक शोषण करना शुरू कर दिया था। हो सकता है कि वे अब अपनी दरिंदगी के अंतिम चरम पर पहुंच चुके हों, क्योंकि रूपम द्वारा उन्हें जेल के पीछे धकेलवाने की कोशिश की जा रही थी।
यहां, रूपम के स्कूल में कार्यरत व अंग्रेजी साप्ताहिक समाचार पत्र क्यूसलिंग के मुख्य संपादक नवलेश की पत्नी रमा का खुलासा मामले को नई दिशा दे रहा है। हालांकि, इस बिंदु को पुलिस ने अब तक जांच के दायरे से बाहर ही रखा है। रमा के अनुसार, रूपम अपनी 18 वर्षीय पुत्री को लेकर चिंतित थी। यह चिंता किस बात को लेकर थी, यह तो वह नहीं बता रही लेकिन उसका यह कहना कि- बात तो कुछ अवश्य थी... बहुत कुछ कह जाता है। पुत्री की 18 वर्ष की उम्र और तिस पर हवस के दरिंदों का उसके घर आना-आना। यह भी संभव था कि अब हवसी भेडि़यों की नजर रूपम से हटकर उसकी जवान हो चली पुत्री पर जा टिकी हो। हत्या का कदम उठाने पर विवश हुई रूपम के मामले में एक बात और गौर करने वाली है कि उसका शोषण पिछले कई वर्षों से हो रहा था। जिस औरत ने अपने शोषण को इतने दिनों तक बर्दाश्त किया, वह अचानक हत्या जैसे कदम उठाने पर विवश हो गयी, यह जानते हुए भी कि इसकी सजा क्या है? तो इसके पीछे के कारण कुछ और भी हो सकते है। क्योंकि जिस औरत ने इतने दिनों तक दरिंदों को झेला था उसके लिए कुछ दिनों और उन्हें झेलना बहुत बड़ी बात नहीं हो सकती थी- न्यायालय की अगली तारीख तक। लेकिन, शायद पानी सिर से ऊपर चला गया था। बात रूपम से उसकी बेटी तक पहुंच चुकी थी जो पत्रकार की पत्नी की बात से साफ होता है। शायद, रूपम अपनी बेटी की बदनामी भी नहीं चाहती थी और इसलिए इस मामले पर अब तक नवलेश व उसकी पत्नी भी अपनी जुबां नहीं खोल रहे हैं। एक मां के लिए अपनी बेटी से बड़ी कोई और चीज नहीं हो सकती थी, खुद उसकी इज्जत भी नहीं। लेकिन बात जब बेटी की इज्जत पर पहुंच चुकी हो तो मां के पास कोई और रास्ता भी नहीं रह जाता...। यदि बात सचमुच रूपम की बेटी तक पहुंच गयी थी तो फिर उसके पास हत्या के अलावा और कोई विकल्प भी नहीं बचता था, वह भी उस परिस्थिति में जब अभियुक्तों को सजा मिलने की उम्मीद दूर-दूर तक न हो। (यहां हम रूपम द्वारा की गयी हत्या को सही नहीं ठहरा रहे, बल्कि एक मां की पीड़ा और उसकी विवशता को बयां कर रहे हैं।)
हत्या के पूर्व रूपम द्वारा नवलेश को लिखा पत्र भी मामले की भयावहता व हत्या के कारणों पर रोशनी डालता है। पत्र में रूपम ने कहा है कि उसने विधायक को फोन कर कहा था- ''आइ विल किल हिम. मैं उसका खून पी जाऊंगी...। विपिन राय (विधायक का गुर्गा) अक्सर अपनी मोटरसाइकिल लेकर स्कूल चला आता। गेट नहीं होने की वजह से वह सीधा मेरे पास आ जाता और छेड़खानी शुरू कर देता। मेरे साथ उसने जबरदस्ती भी की और जब मैंने केसरी जी से यह शिकायत की तो उन्होंने अनसुना कर दिया। वह मुझे आए दिन कहीं-कहीं मिल जाता और डराता रहता था कि मैंने उसकी बात नहीं मानी तो वह सभी को बता देगा।'' पत्र की बातें बताती हैं कि उत्पीड़न का मामला किस हद तक पहुंच चुका था। रास्ते में, स्कूल में, घर पर हर जगह यौन शोषित हो रही व गंभीर मानसिक तनाव झेल रही रूपम द्वारा लिखे पत्र की यह लाईन - वह मुझे आए दिन कहीं-कहीं मिल जाता और डराता रहता था कि मैंने उसकी बात नहीं मानी तो वह सभी को बता देगा.. भी कुछ कहती है। मसलन, विपिन रूपम को किस बात के लिए ब्लैक मेल कर रहा था? जाहिर है कि रूपम के किसी से संबंध होने की बात का खुलासा करने की धमकी तो वह नहीं ही दे रहा होगा, क्योंकि स्वयं रूपम अपने यौन उत्पीड़न का आरोप लगा चुकी थी। सीधी सी बात है कि रूपम अपनी स्वयं की बदनामी से तो नहीं ही डरती थी वरना उसने खुद के यौन शोषण का खुला आरोप विधायक पर नहीं लगाया होता। यानी कि उसके यौन संबंधों आदि को लेकर उसे ब्लैकमेल नहीं किया जा सकता था। बात इससे कुछ इतर थी, जिस पर रूपम ब्लैकमेल होती रही। इस बीच रमा पाठक की बात याद आती है- बात तो कुछ थी ही...। हालांकि, अब सीबीआई जांच की अनुशंसा हो चुकी है और उम्मीद है कि जल्द ही इस मामले में अन्य कई चेहरे भी बेनकाब होंगे और सभी सवालों के जवाब मिल जायेंगे।
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