ये तो दरिंदगी है
जिंदगी में जब-जब ख्वाहिशें जुनून बनकर किसी व्यक्ति के भावनाओं पर हावी हो जाती हैं, तब-तब कुछ ऐसा होता है, जिसकी हम कल्पना ही कर सकते हैं। यदि यह ख्वाहिश अच्छी चीजों के लिए, नेक नीयत से हो तो कलयुग में सतयुग का चेहरा दिखता है और यदि यह ख्वाहिश बुरी या अच्छी चीज के लिए हो, लेकिन इसके पीछे की नीयत बुरी हो तो, इतिहास दागदार हो जाता है। जिंदगी में हर व्यक्ति को तमाम चीजों की ख्वाहिश होती है लेकिन अच्छा इंसान वहीं होता है जो अपनी ख्वाहिशों को पूरी करने के लिए दूसरे की ख्वाहिशें या उसकी खुशियों का गला न घोंटे। यदि किसी इंसान की किसी ख्वाहिश पूरी होने में किसी अन्य व्यक्ति की खुशी छीनती है, तो उसे अपनी ख्वाहिश ताक पर रख देनी चाहिए। तभी वह अच्छा इंसान बन सकता है। हमारा संविधान भी कहता है कि हम तभी तक स्वतंत्र हैं जब तक कि दूसरे की स्वतंत्रता को प्रभावित नहीं करते। फिर, क्या अपने स्वार्थ के लिए किसी की भावनाओं का गला घोंट देना, किसी से उसका चिराग छीन लेना, किसी को मौत के घाट उतार देना कभी सही हो सकता है। कतई नहीं। जहां कहीं भी हमारे रास्ते में दूसरे की खुशियों को ठोकर लगनी शुरू हो जाएं, हमें अपने रास्ते बदल लेने चाहिए। रास्ते तो बहुत हैं, फिर उसी राह से चलने की क्या मजबूरी है। उत्तर प्रदेश के कांशीराम नगर निवासी एक दंपत्ति ने जो घिनौता कृत्य किया है उसके लिए न तो समाज और न ही कानून उन्हें माफ करेगा। आगे भगवान तो उनकी सजा पहले ही दे चुके हैं, उन्हें नि:संतान कर।
उत्तर प्रदेश के कांशीराम नगर जिले के अमांपुर थाना क्षेत्र में एक गांव है। नाम है शाहपुर। इस गांव में रहने वाले एक दंपत्ति को पुत्र रत्न की बड़ी ख्वाहिश है। इसके लिए दंपत्ति ने कई प्रयास किए और आखिरकार उन्होंने इसकी प्राप्ति के लिए एक तांत्रिक का सहारा लिया। बस फिर क्या था, तांत्रिक ने उन्हें उपाय सुझाया कि वे किसी नाबालिग बच्चे की बलि दें तो उनकी मुराद पूरी हो जाएगी। पुत्र ख्वाहिश में अंधे हो चले दंपत्ति ने तांत्रिक के उपायों पर कोई विचार न करते हुए उसे अंजाम देने का भयानक निर्णय ले डाला। फिर उन्होंने एक योजना बनाई और 12 अप्रैल को बलि का दिन मुकर्रर हुआ। दुष्ट दंपत्ति, पड़ोसी चन्द्रपाल के 3 वर्षीय पुत्र ओमपाल को गांव के बाहर वाले मंदिर में ले गए। वहां उन्होंने उसकी बलि दे दी। बलि के बाद उन्होंने लाश को बोरे में बांधकर मंदिर के पास फेंक दिया। स्थानीय थाना प्रभारी एमसी गंगवार ने इसी दिन मंदिर के पास से बोरे में ओमपाल का शव बरामद कर लिया। जब बोरे को खोला गया तो पाया गया कि मृत ओमपाल का सिर धड़ से अलग है और दोनों हाथ कटे थे। जो उसकी बलि की पुष्टि कर रहे थे। थाना प्रभारी ने तत्काल उक्त दंपत्ति को गिरफ़तार कर लिया लेकिन असली मास्टर माइंड यानी तांत्रिक पुलिसिया गिरफ़त से अब भी बाहर है।
यह तो थी एक गांव के एक दंपत्ति की कहानी। अब हम बात करते हैं इसके पीछे के कारणों की। यह तो सभी जानते हैं कि बीमारियां चिकित्सक दूर करते हैं, तांत्रिक नहीं। फिर लोग तांत्रिक के पीछे क्यों भागते हैं। धरती पर भगवान की संज्ञा भी चिकित्सकों को ही दी गयी है, न कि तांत्रिकों को। यह अलग बात है कि यदि ईश्वर ना चाहें तो चिकित्सक भी कुछ नहीं कर सकता। फिर क्या यह सत्य नहीं है कि यदि ईश्वर ना चाहें तो तांत्रिक भी कुछ नहीं कर सकता। क्या कोई तांत्रिक ईश्वर से भी बड़ा है। पहली तो बात यह है कि भूत-प्रेत होते नहीं। और एक बार के लिए यदि हम मान लें कि भूत-प्रेतों का अस्ितत्व है और वे किसी को प्रभावित करते हैं तो हम यह क्यों भूल जाते हैं कि ईश्वर भी हैं और वे भूत-प्रेतों से बहुत ही अधिक शक्तिशाली हैं। फिर अपनी किसी इच्छापूर्ति के लिए ईश्वर की शरण में न जाकर भूत-प्रेतों के उपासक तांत्रिकों के पास क्यों चले जाते हैं। इन तांत्रिकों को भी तो ईश्वर ने ही बनाया है, न कि भूत-पिचाशों ने। क्या ये तांत्रिक अपनी मर्जी से अपनी जिंदगी की इबारत लिख सकते हैं। क्या ये खुद को दीर्घायु बना सकते हैं। क्या ये स्वयं को आजीवन निरोग रख सकते हैं। जवाब निश्चित ही ना में है। फिर जो खुद के लिए कुछ नहीं कर सकता वह किसी और के लिए क्या करेगा। जब इन तांत्रिकों की तकदीर भी ईश्वर ही लिखता है तो फिर इन्हें दूसरों की तकदीर लिखने की शक्ति कहां से आयी। फिर एक बार को यदि हम यह भी मान लेते हैं कि इन तांत्रिकों के पास शक्ति होती है और ये कुछ भी कर सकते हैं तो हम यह भी तो जानते हैं कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है, और वह सब कुछ कर सकता है। इसके साथ ही हम यह भी जानते हैं कि ईश्वर तक पहुंचने का रास्ता सही है जबकि भूत-प्रेतों के उपासक के पास जाने का रास्ता गलत। फिर क्यों नहीं हम सही रास्ते का चुनाव करते हैं, जबकि सही रास्ते पर चलते हुए हमारी इच्छा की पूर्ति जल्दी हो सकती है। पढे-लिखे होने के बावजूद कोई क्यों इन ढोगियों की चाल में आ जाता है। हमें यह तय कर लेना चाहिए कि दुनियां में ईश्वर के अलावा कोई भी ऐसी शक्ति नहीं जो कि उसके समानांतर हो। इसलिए हमें किसी भी इच्छापूर्ति के लिए ईश्वर की आराधना करनी चाहिए और सिर्फ ईश्वर की। जैसा कि आप सभी जानते हैं तंत्र विद्या है तो अवश्य, लेकिन उसके साधक शहर में नहीं, जंगलों, बियाबानों या पर्वतों पर मिलते हैं। और जो शहर में मिलते हैं वे तांत्रिक, साधु, साधक नहीं बल्कि व्यवसायी होते हैं। इनका तो काम ही होता है दूसरे की भावनाओं का लाभ लेकर उससे रुपये ऐंठना। एक पल को गौर करें कि यदि कोई वर्षों जंगलों, पर्वतों पर रहकर साधना करता है और उसे कोई शक्ति प्राप्त होती है तो क्या वह चंद रुपयों के लिए इस शक्ति का इस्तेमाल करेगा। यही नहीं हम यह भी क्यों नहीं सोचते कि जिन शक्तियों की बदौलत ये तांत्रिक हमें सबकुछ दिलाने का भरोसा देते हैं, ये शक्तियां भी तो उन्हें ईश्वर से ही प्राप्त होती है। फिर ईश्वर से भरोसा तोड़कर, तांत्रिकों से जोड़ने का क्या मतलब है। ईश्वर मुक्ति के माध्यम हैं जबकि तांत्रिक अनिष्ट करने का निमंत्रण देने वाले शैतान। प्रत्येक व्यक्ति को यह तय कर लेना चाहिए कि ईश्वर के अलावा कोई अन्य शक्ति नहीं जिसका इस दुनियां पर सिक्का चलता हो। यह अटल सत्य है कि ईश्वर के बताए रास्तों पर न चलकर दूसरे रास्तों को चुनने वालों को सजा मिलती है, वरदान नहीं।
अब हम बात करते हैं मानवीय पहलू की। जब दंपत्ति पुत्र के लिए तड़प रहे थे और उन्होंने दूसरे के पुत्र की बलि देने की सोची तो क्या उनके मन में एक पल को भी यह विचार नहीं आया कि जब उस व्यक्ति का पुत्र चला जाएगा तो उस दंपत्ति पर क्या गुजरेगी। इस दंपत्ति ने खुद को मिली सजा दूसरे को भी दे डाली। क्या कोई प्यार करने वाला किसी दूसरे का प्यार छीन सकता है। और जो किसी अन्य का प्यार छीनें, क्या वह प्यार करने वाला हो सकता है। दोनों अलग-अलग बातें है। जो व्यक्ति किसी भी एक से यदि सच्चा प्यार करता है तो वह किसी अन्य दूसरे से नफरत नहीं कर सकता है। एक ही व्यक्ति का मन दो लोगों के लिए अलग-अलग कैसे हो सकता है। इसी तरह खुद पुत्र रत्न की ख्वाहिश पालने वाले दंपत्ति दूसरे के पुत्र के हत्यारे कैसे हो सकते हैं। और जो दूसरे के पुत्र की हत्या कर सकता है, क्या कभी वह मां या बाप बनने लायक है। निश्चित ही नहीं है। जो दर्द हम दूसरे को देते हैं क्या उससे पहले खुद वह दर्द सहकर यह पता करने की कोशिश करते हैं कि सामने वाले को कितना दर्द होता होगा। एक बार के लिए भी यदि ओमपाल के माता-पिता के रूप में खुद को रखकर यदि दुष्ट दंपत्ति ने सोचा होता तो वे कभी हत्यारे नहीं बनते। सबके लिए यही एक बात है कि हम जो व्यवहार दूसरे के साथ करने जा रहे हैं, उससे पहले खुद को कुछ देर के लिए वह बना लें और फिर देखें कि ऐसा व्यवहार खुद के साथ किया जाना चाहिए या नहीं। यदि खुद के साथ नहीं किया जाना चाहिए तो दूसरे के साथ भी ऐसा व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए। फिर, कोई भी गलत कार्य नहीं होगा। यह तो हुई मानवीयता की बात। अब यह देखा जाए कि क्या बलि लेकर ईश्वर कभी खुश हो सकते हैं। मां दुर्गा तो जीवनदायिनी हैं, फिर उनके समक्ष किसी की बलि को वे कैसे बर्दाश्त कर सकती है। उदाहरण भी सामने हैं। दंपत्ति ने हत्या की और पकड़े गए। की तो हत्या, नाम दे दिया बलि का। बलि चाहे इंसान की हो, या जानवर की, वह ईश्वर को खुश नहीं कर सकती। ईश्वर को खुश करना है तो हमें खुद को समर्पण करना होगा। किसी अन्य को कष्ट देकर हम प्रभु कृपा नहीं पा सकते।
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